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पत्रकार अपनी लक्ष्मण रेखा को पार किए, तभी हो रहा तमाशा

Saturday, April 25, 2020

/ by Editor

हरिकेश यादव-संवाददाता (इंडेविन टाइम्स)

अमेठी ।

कोरोना वायरस महामारी से बचाव के लिए जो अभियान प्रशासन चलाया है उससे कहीं ज्यादा समाचारों का कबरेज हो रहा है। यहां तक कि जनहित के समाचारों को भी कबरेज करने से लोग असहज महसूस कर रहे हैं। यही नहीं इस जिले के दूसरे जिलों में मीडिया कर्मियों के रूप में काम करने में लगे हैं। उन्हें भी अपने घर आने - जाने में जिले की सीमा पर लगे नोडल अधिकारी कुछ भी सुनने को राजी नहीं हैं। यह हाल अमेठी जिले में चल रहा है। मीडिया का नाम सुनने के बाद जारा सा भी ख्याल प्रशासन अमल करने को तैयार नहीं है।

तो ऐसी दशा में मीडिया को भी कबरेज में जनहित, और लोकतंत्र की लक्ष्मण रेखा को पार नहीं करनी चाहिए। कोरोना वायरस महामारी में मीडिया के लिए गौरीगंज के बिधायक राकेश सिंह ने दो लाख रुपये दिये। लेकिन मीडिया को एक अकेला सुबिधा नहीं मिली और ना ही बिधायक श्री सिंह ने दुबारा सुबिधा दिये जाने की पहल की। आखिर यह अनदेखी कब तक होगी। प्रशासन और शासन भी उतना सहयोग नहीं चाहता जितना लोग देने को रजामन्द है। कहना तो नहीं चाहिए लेकिन इस तरह के कारनामों के बाद प्रशासन के इस तरह के बर्ताव के बाद उन्हें भी याद करना लाजिमी है जिन्हें प्रशासन की बीट मिली है।

उन्हें बनी बनाई खबर मिल जाय तो इस महामारी से बचाव के लिए अपने ही कर्मियों का गला दब जाय तो उनका दोष नहीं है। लेकिन इतना ख्याल रखना होगा कि मीडिया कर्मियों के रास्ते ही प्रशासन जाम कर दे अपनी जिद पर अडी रहे। अब तो पुलिस उठा बैठक करने तक उतर चुकी है। इतना ही ईमानदारी से दरोगा काम करने में लगे हैं। मीडिया परिवार के संगठन आगामी 30 मई 2020 को पत्रकारिता दिवस पर अपने लिए क्या संकल्प लेने के लिए तैयारी कर रखी है उन्हें भीछोटे और मझोले समाचार पत्र, एजेंसी के हितों की रक्षा के लिए सोचना होगा। अन्यथा सोशल मीडिया  ने तो कडुवा घूंट पिलाना शुरू कर दिया।

कितनी खबर सोशल नेटवर्किंग साइट्स और बेवसाइट के सहारे अब प्रशासन को भी अपनी नई जिम्मेदारी निभाना पड रहा है। लीड समाचार पत्र को भी मीडिया से जुड़े कर्मियों को सहेजना पडेगा नहीं तो मीडिया की लक्ष्मण रेखा की डोर कमजोर हो जायेगी। यह दर्द आज नहीं तो कल छलक कर चोथे स्तम्भ की बात सड़क पर अपने आप आ जायेगी। मीडिया में लगे उद्योग पतियों को करारा झटका लगेगा।

बिना प्रेस कार्ड, कम मानदेय पर, जबरन अनुबंध पत्र लेना,शौकिया पत्रकारिता, बिज्ञापन की अनिवार्यता, साल भर के लिए अंशकालिक प्रतिनिधि, संबाद सूत्र आदि के शब्द को जल्द अन्तिम पडाव पर लाना होगा। चौथे स्तंभ को मीडिया उद्योग पति के कब तक मेहबान रहना होगा। अब मीडिया को नई सोच के साथ काम करने की जरूरत है। सबको पारदर्शी बनाने वाली मीडिया को चौथे स्तंभ के रूप में बढ़ चढ़ कर स्थापित करने की कोशिश करना होगा।

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