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मंहगाई के साथ कोरोना का संक्रमण तेज

Wednesday, April 29, 2020

/ by Editor

हरिकेश यादव-संवाददाता (इंडेविन टाइम्स)

अमेठी। 

० कई ग्राम पंचायतो में गन्दगी का अम्बार   

०जिले की सीमा पर मीडिया और सरकारी कर्मचारियों को आने_जाने में बाधा   

महामारी कोरोना वायरस के चलते सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, उप स्वास्थ्य केन्द्रों पर बीमार लोगों के इलाज में परेशानी हो रही है। चिकित्सकों, स्वास्थ्य कर्मी मरीज देखने के बाद दवाओं के पर्चे लिख दिये जाते हैं। वे रोगी की बात सुनने को राजी नहीं हैं।  जिद करने पर स्वास्थ्य कर्मी कहते हैं कि इस समय सिर्फ अस्पताल में कोरोना  महामारी का इलाज हो रहा है बाकी सेवा बंद हैं। 

महामारी के चलते प्रशासन ने  खाद्य पदार्थों की आपूर्ति के लिए दुकानों की सूची प्रशासन ने जारी की। सुबिधा - घर-परिवार तक पहुंचायी जायेगी। लेकिन ऐसा दुकानदार करने को राजी   नहीं हैं। अपनी दुकान से ही खाद्य पदार्थों में तेल, मसाला, साबुन, नमक, बिस्कुट, नमकीन, मूँगफली व मेवा की बिक्री कर रहे है।सामाजिक दूरी के सवाल अब तक हजारों की तादाद में दुकानदारों के खिलाफ कार्यवाही की गई ।

गिरफ्तार कर उन्हें मुचलके पर रिहा किया गया। फिर भी दुकानदारों ने मनमाने दर खादय पदार्थ को बेच रहे हैं। आमतौर लोग लाक डाउन को समझ नहीं पाये। अफवाह शातिरो ने फैलाया कि घर से निकलने पर चलान हो रहा है। पुलिस लाठियों से बहुत पीटती है। फिर गृहस्थी के झंझट और आर्थिक तंगी वैसे भी लोगों को तबाह कर दिया है। इसके चलते मंहगाई ने लोगों का  खून चूस लिया। 

लाक डाउन में जिले की सीमा को सील कर दिया गया है। लेकिन सरकारी अधिकारी और कर्मचारी के साथ ही साथ मीडिया कर्मियों को आने जाने में नोडल अधिकारी से नोक झोंक सहजीपुर, परितोष, कोहरा (देवरी), छीडा,धनापुर नरायनपुर आदि स्थानों पर अक्सर होतीं रहती हैं। बहुत बात होने पर अधिकारी कहते हैं कि जाओ लेकिन लौटने नहीं देगे। जिले के कई ग्राम पंचायतों में स्वास्थ्य एवं पेयजल समिति ने कीटनाशक दवाओं का छिड़काव जल निकासी नाली, नाला, इण्डिया मार्क टू हैण्डपम्प के प्लेटफार्म, कुआं, घरों के नाबदान में नहीं करवाया ।

इसके अलावा गांव में सफाईकर्मी भी माह भर से बस्ती में नजर नहीं आए जब संक्रमण के रोक थाम के लिए प्रशासन - शासन गैर जिम्मेदार है तो कोरोना वायरस महामारी से बचाव की लड़ाई कितनी कारगर साबित होगी। जनप्रतिनिधि के प्रतिनिधि सिर्फ अपनी बनाने में लगे हैं। उन्हें जनहित के प्रयासों से कोई लेना-देना नहीं है। जब जनता के चुने हुए नुमाइंदे लोगों से दूरी बना रहे हैं।

जबकि जो सुख - दु:ख में जनता के साथ रहे। वहीं सच्चा जनप्रतिनिधि हैं। बडे़ शहर, बड़े भवन, लग्जरी कार, प्रतिनिधियों के सहारे काम करने पर जनता ऐन वक्त पर मुंह फेरने के अलावा और कौन चारा बचता है। अधिकारी तो मुसाफिर है जिस गली से गुजरते हैं दुबारा लौटने की अक्सर नौबत नहीं आती है। और दुबारा लौटे भी तो वह वक्त नहीं रहता ना वह लोग ही रहते हैं।

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