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ऐसा था ब्रह्मर्षि श्री देवराहा बाबा का व्यक्तित्व

Monday, June 15, 2020

/ by Editor
प्रस्तुती- आचार्य डॉ प्रदीप द्विवेदी
संपादक एवं लेखक

परम पूज्य ब्रह्मर्षि योगिराज श्री देवराहा बाबा सरकार के विषय में कुछ भी लिखना/कहना/बताना हमारे लिये सम्भव ही नहीं है क्योंकि यह बात हमें बहुत अच्छी तरह पता है कि हम इस विषय में कभी न्याय कर ही नहीं सकते हैं | कुछ भी बताएँगे तो बहुत कुछ रह जायेगा जो ज्ञात होते हुए भी नहीं बता पाए | फिर जो ज्ञात नहीं है, उसकी क्या बात कहेंगे ? पूज्य बाबा सरकार की भी यह इच्छा नहीं थी कि उनका वास्तविक स्वरूप सबके सामने आये | महामहोपाध्याय पद्मविभूषण डॉ. पं. गोपीनाथ कविराज जी ने एक बार पूज्य बाबा सरकार से आग्रह किया था कि वो अपने बारे में लिखने की अनुमति दें, तो बाबा ने कहा कि कुछ भी इधर-उधर करके लिख दो पर ज्यादा बातें मत बताना | वास्तव में तो योगिराज को कोई योगी ही समझ सकेगा | हमारे जैसे साधारण प्राणी तो बस चमत्कारिक घटनाओं को जानकर रोमांचित हो लेते हैं | पूज्य बाबा सरकार के जन्म और आयु को लेकर भी रहस्य ही रहा है | हम नीचे जो कुछ भी लिख रहे हैं उससे भी कोई रहस्य सुलझेगा नहीं, और न ही यहाँ बाबा की कृपा से घटित होने वाली असंख्य अलौकिक घटनाओं में से ही किन्हीं का वर्णन है | 

हम तो बस बाबा के बारे में सतही रूप से कुछ बता रहे हैं, और यह बातें उन्हीं बातों में से हैं जिन्हें हमने अपने गुरुदेव और पूज्य बाबा के परम प्रिय शिष्य वैकुंठवासी अनंतश्री विभूषित श्रीमज्जगद्गुरु रामानुजाचार्य श्रीसुग्रीवकिलाधीश जी महाराज से सुनी थीं | पूज्य महाराज जी ने देवराहा बाबा से योग की विद्या प्राप्त करी थी और विन्ध्याचल, हिमालय आदि सिद्ध तपोभूमि में रहकर तप एवं योग-साधना करी थी | महाराज जी ने भी अपने विषय में ज्यादा चर्चा नहीं करी |  चूंकि हमारी रुचि योगियों, सिद्धों, सिद्धाश्रमों के विषय में जानने की रही है, तो कभी-कभी महाराज जी से इन विषयों को पूछने का साहस कर लेते थे | तब महाराज जी अनेक विलक्षण बातें बताते थे | महाराज जी तो श्रीअयोध्या धाम में रहते हुए, चर्चा चलने पर, हमें लखनऊ के स्थानों का (कि वर्तमान में क्या चल रहा है) सटीक वर्णन कर देते जो हमें बाद में देखने को मिलता था |

विश्वासी वैष्णव हृदय चाहे जितने भी तमसाच्छन्न क्यों न हों, दुःख-दुर्दिन-दुर्दशा से तरंगायित संसार समुद्र में चाहे जितने भी उद्विग्न तथा भयभीत क्यों न हों, ज्यों ही वे श्रीगुरु महाराज का स्मरण करते हैं त्योंही उनके सकल संताप दूर हो जाते हैं | सिद्ध संत श्रीरामकृष्ण परमहंस जी कहते थे कि कोई कमरा चाहे हजारों वर्षों से ही अंधकाराच्छ्न्न क्यों न हो, दियासलाई की एक तीली घिसते ही आलोकित हो उठता है, उसमें घनीभूत तमोराशि तत्काल ही विनष्ट हो जाती है; इसी प्रकार अग्नितुल्य पवित्र तथा उज्ज्वल श्रीगुरुदेव का नाम एक बार भी उच्चारित करने से हृदय की समस्त ग्लानि तुरंत भस्मसात हो जाती है |बस इसीलिए हम पूज्य गुरुदेव का स्मरण कर रहे हैं |

गुरुजनों का जीवन सर्वदा दूसरों के लिये समर्पित होता है | वे अपने किसी उद्देश्य की सिद्धि हेतु भूतल पर अवतरित नहीं होते | उनका हृदय सर्वदा ही दीन, दरिद्र, असहाय जीवों के दुःखनाश की चिंता से परिपूर्ण रहता है | समग्र जीवों की मंगल-कामना में निमग्न रहकर वे लोग कल्याण-प्राप्ति के लिये जिन उपायों का निर्धारण करते हैं, उन्हें जान लेने तथा उनके अनुगामी होने पर इस जगत में परम सुख के साथ जीवन-यापन किया जा सकता है और परलोक का पथ भी निष्कंटक तथा निर्बाध होकर अंत में मोक्ष की उपलब्धि होती है | 

शेषावतार श्रीरामानुज महामुनीन्द्र के पवित्र संप्रदाय में श्रीवैष्णव-जगत के महान आचार्य श्रीवेदान्तदेशिक जी  का प्राकट्य हुआ | ये बहुत बड़े विद्वान, प्रचारक, महान भक्त, परम आदर्श-चरित्र महात्मा थे | श्रीवेदांतदेशिकाचार्य जी चमत्कारपूर्ण जीवन सर्वथा वन्दनीय है | इनकी परंपरा में आगे चलकर तीन प्रधान मठों की स्थापना हुई- अहोविल मठ, मुनित्रय मठ और परकाल मठ | इनसे सम्बंधित उपप्रधान मठों की स्थापना सारे भारत में हुई है जिनके अनुयायी लाखों की संख्या में देश भर में श्री वैष्णवता का प्रचार प्रसार कर रहे |

अहोविल मठ से सम्बंधित श्री श्रीनिवासाचार्य जी महाराज ने उत्तर देश में अपने शिष्यों द्वारा अनेक स्थलों में देवालयों की स्थापना करायी | इनमें पुष्कर, चित्रकूट और वाराणसी में विशेष मठों की स्थापना हुई | श्री श्रीनिवासाचार्य जी के प्रधान शिष्य श्री नरसिंहाचार्य जी महाराज ने काशी में श्री द्वारिकाधीश भगवान के मंदिर  की स्थापना करी | ये वही स्थान है जहाँ भगवान श्री कृष्ण ने पौण्ड्रक नरेश को अपने सुदर्शन चक्र से समाप्त कर विजय ध्वज गाड़ा था | इसी परम्परा में श्री स्वामी कृष्णाचार्य जी महाराज हुए जिनके दो शिष्य हुए- श्री स्वामी माधवाचार्यजी महाराज और श्री स्वामी श्रीगोपलाचार्य जी महाराज |

कहते हैं कि आर्यसमाज के संस्थापक महाविद्वान दयानंद सरस्वती को काशी में शास्त्रार्थ करके निरुत्तर बना देने वाले श्री स्वामी माधवाचार्यजी ही थे परन्तु गृहस्थ हो जाने के कारण स्थान के पीठाधिपति नहीं बनाये गए | इस दायित्व को महान तपस्वी तथा विद्वान उनके अनुज स्वामी श्री गोपालाचार्य जी ने संभाला और भगवान द्वारिकाधीश की सेवा करके कई विशेष आदर्शों की स्थापना की |

इनके उत्तराधिकारी परम पूज्य स्वामी श्री जनार्दानाचार्य हुए | जब ये वयोवृद्ध हो गए और अपनी इच्छानुरूप योग्य उत्तराधिकारी नहीं पा सके तो भगवान से ही इन्होंने प्रार्थना करी | ‘भगवन ! अब मेरी अवस्था सेवा करने के दायित्व को निभाने में असमर्थ है | प्रभो ! कोई उपयुक्त उत्तराधिकारी देकर मुझे चिंतामुक्त करें’ | तब भगवान ने इनसे स्वप्न में ही कहा कि तुम चिंता मत करो | कल प्रातःकाल तुम गंगा तट पर जहाँ बैठकर तुम संध्यावंदन करते हो और तदन्तर अपना नित्य नियम संपन्न करते हो वहाँ पर ही जब पाठ कर रहे होगे तब जब गीतापाठ प्रारंभ करोगे उसी समय एक महात्मा आयेंगे और अंत में जब वह तुम्हारे चरणों में दण्डवत करें तो वही तुम्हारे शिष्य होंगे | यद्यपि वह परम विरक्त और महायोगी हैं तथापि उन्होंने वैष्णव दीक्षा अभी नहीं ली है | वह तुम्हारे द्वारा ही दीक्षा स्वीकार कर वैष्णव बनेंगे और ऐसा ही हुआ |

दूसरे दिन गीता के जिस श्लोक को यह पढ़ रहे थे उसी के उत्तरार्द्ध का पाठ करते हुए महात्मा इनके चरणों में साष्टांग करते हुए अनवत हो गए और प्रार्थना करने लगे ‘महाराज! मैं आप की शरणागति लेकर वैष्णव दीक्षा की प्रार्थना कर रहा हूँ | आप कृपा करके मुझे वैष्णव बनायें | यह महात्मा ही बाद में श्री देवराहा बाबा जी के नाम से प्रसिद्ध हुए |

पूज्य बाबा सरकार बाल्यावस्था में ही घर-बार से विरक्त होकर उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों में योग के साधनों का ज्ञान प्राप्त कर चुके थे | बाबा समाधि तक का ज्ञान और अनुष्ठान संपन्न कर चुके थे और समाधि में ही इनको काशी जाकर वैष्णव होने की प्रेरणा मिली थी | भगवान ने आदेश दिया था कि समाधि-सिद्ध योगियों को भी वैष्णवोचित आचार-विचार और भक्ति-भावना की आवश्यकता होती है | भगवान ने कहा कि तुम्हारे पूर्व जन्म के गुरुदेव इस समय काशी में हैं उनसे दीक्षा लेकर मेरी सेवा में लगकर अपनी साधना को पूर्णता प्रदान करो | भगवान के इसी आदेश के अनुसार ये काशी पहुँचे थे और अपना अभीष्ट मनोरथ पूरा करके गुरु सेवा और भगवत्सेवा में संलग्न हो गए |
गुरूजी की आज्ञानुसार यह प्रातः उनके राजभोग आदि की व्यवस्था संपन्न करके रख देते | फिर गुरूजी से आज्ञा लेकर किसी एकांत स्थान में बैठकर अपने साधन भजन में लीन हो जाते | दोपहर बाद फिर समागत संतों की सेवा संपन्न करके ये पुनः भजन में लीन हो जाते | इसी तरह सांयकाल आरती के समय रात्रि की उपयुक्त सेवा करके भगवद भजन में लीन हो जाते |
ऐसा एक वर्ष तक सेवा कार्य संपन्न करते हुए फिर ये गुरूजी की आज्ञा लेकर तीर्थाटन को चल दिए और प्रायः गंगा, यमुना, नर्मदा आदि नदियों की परिक्रमा करते हुए सरयू जी की परिक्रमा में संलग्न हो गए | ये किसी प्रकार का कोई परिग्रह नहीं करते थे | यहाँ तक कि शरीर पर एक सूत भी वस्त्र नहीं होता | हाथ ही उनका पात्र होता और वे दिगंबर ही रहते |
एक बार बाबा सरयू जी के किनारे भ्रमण कर रहे थे | उस समय उस जगह भयंकर सूखा पड़ा था | मनुष्य एवं पशु-पक्षी सब बहुत भारी विपत्ति में थे | ऐसी स्थिति में कुछ ग्रामीण सरयू तट पे संकीर्तन कर रहे थे | आधी रात थी | तभी लोगों ने बाबा के दर्शन किए | सबको लगा कि भगवान स्वयं आ गए | उन्होंने अपनी दुर्दशा बाबा को सुनाई और प्रार्थना करी कि बाबा इनकी रक्षा करें | बाबा ने कहा कि मेरे लिये यही एक झोपड़ी बना दो और जब तक मैं न कहूँ संकीर्तन करते रहो | लोगों ने वैसा ही किया और सुबह तक झोपड़ी बना दी | बाबा ने सरयू में डुबकी लगाई और कहा कि अब सब घर जाओ तेज वर्षा होने वाली है | तभी वहाँ भरपूर वर्षा हुई | तब तो बाबा के दर्शनों को दूर दूर से लोग आने लगे और सदा झोपड़ी के पास संकीर्तन होने लगा |

बाबा ने भी भगवान की इक्षा समझ इस कार्य को चलने दिया | यहाँ के लोग नदी के किनारे को ‘दियर’ कहते थे और नदी के किनारे रहने के कारण लोग आपस में इन्हें ‘दियरअहवाबाबा जी’ कहने लगे जो आगे चल कर ‘देवराहा बाबा’ नाम से प्रसिद्ध हुआ |

श्री बाबा सरकार के रहन-सहन, उनके अलौकिक दिव्य तेज, शास्त्रों का सूक्ष्म ज्ञान, अति विशाल दृष्टिकोण एवं समस्त जीवों के प्रति आत्मीयता की भावना के कारण उनकी ख्याति उत्तर प्रदेश और बिहार में दूर-दूर तक फैल गयी | श्री बाबा सरकार तो सरयू जी में ही कुछ लकड़ी के खम्बों पर बनी कुटिया में रहते थे | जनता से दूर रहकर, दूर से ही लोगों को दर्शन आदि देकर विदा कर देते थे | श्री बाबा सरकार किसी भी प्रकार का दान या भेंट स्वीकार नहीं करते थे | स्वीकार करना की बात तो दूर, श्री बाबा सरकार के समक्ष ऐसा कोई अवसर ही नहीं होता जो कोई दान आदि देने की बात भी उठे | फिर भी लोग श्रद्धावश जो फल आदि लाते थे उन्हें श्री बाबा सरकार उन्हीं में वितरित कर देते थे |

पूज्य बाबा सरकार के शरीर पर किसी प्रकार का कोई वस्त्र नहीं रहता था | ओढ़ना-बिछौना आदि केवल कुशा की चटाई से ही संपन्न होता | श्री बाबा सरकार की दिनचर्या भगवान दत्तात्रेय जी की याद कराती थी | साथ ही श्री बाबा सरकार ने अपनी गुरुपरंपरा के अनुसार व्यावहारिक दायित्वों का भी सुचारुरूप से निर्वाहन किया | अपने गुरुदेव श्री जनार्दनाचार्य जी के बाद श्री द्वारिकाधीश भगवान की सेवा का इन्होंने सुचारू प्रबंध किया |

पूज्य बाबा सरकार ने वेदभाष्य कर्ता सातवलेकर जी को ‘ब्रह्मर्षि’ की उपाधि से सम्मानित किया | इन्होंने ही श्री पुरुषोत्तमदास टंडन जी को ‘राजर्षि’ की उपाधि प्रदान करी थी | इसी प्रकार श्री वैष्णव संप्रदाय के मूर्धन्य विद्वान एवं महातपस्वी श्री स्वामी रघुनाथाचार्य जी महाराज को ‘जगद्गुरु’ के सम्माननीय पद पर विभूषित किया |

स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्रप्रसाद जी ने बाबा सरकार से प्रयाग कुम्भ में आने का आग्रह किया | बाबा सरकार भीड़-भाड़ से दूर ही रहना पसंद करते थे | तब प्रसाद जी की इस बात को मनवाने के लिये और बाबा को कुम्भ में लाने के लिये संतशिरोमणि श्री प्रभुदत्तजी ब्रह्मचारी एवं राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन जी अनशन तक करने को तैयार हो गए थे जिस कारण बाबा ने कुम्भ में आकर आशीर्वाद दिया | श्री राजेन्द्रप्रसाद जी ही पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें पूज्य बाबा सरकार के चरण स्पर्श का सौभाग्य प्राप्त हुआ था |

परम पूज्य ब्रह्मर्षि योगिराज श्री देवराहा बाबा जी महाराज के जीवन में इतनी अलौकिक घटनाएँ हैं कि जिनका वर्णन करना असंभव ही है | पर जितना हो सके हमें पूज्य बाबा की महिमा का गान करते रहना चाहिए |

पूज्य बाबा महाराज जल में जलजंतुओं के समान ही रह जाते थे | जल पर ऐसे चलते जैसे पृथ्वी पर चल रहे हों | जल पर ही आसन लगाकर ध्यान-भजन में मग्न हो जाते थे | सिंह-व्याघ्र, रीछ आदि हिंसक जीवों को पुत्रवत लाड-प्यार करते थे |

पूज्य बाबा महाराज जानता को कुछ विशेष आज्ञा देते थे जैसे – भारतीय संस्कृति का पुनरुत्थान, गंगा जी की शुद्धि, गौहत्या पर रोक, गौ माता की सेवा, श्री रामजन्मभूमि मंदिर का उद्धार |

पूज्य महाराज जी कहते थे कि श्रीराम के आदर्शों की स्थापना से ही समस्त मानव जाति का कल्याण हो सकता है इसीलिए जन-जन तक उन आदर्शों का प्रचार करना उनके शिष्यों का प्रधान कर्तव्य है | इसी उद्देश्य से श्री महाराज जी ने तीर्थराज प्रयाग में “अखंड श्रीराम ज्योति” का अखण्ड दीप प्रज्जवलित किया और ज्योति का प्रकाश घर-घर पहुँचाने के लिये इसको लेकर यात्रा करने का आदेश दिया | इसके संचालन का भार पूज्य बाबा ने अपने शिष्य स्वामी पुरुषोत्तमाचार्य जी को दिया और अपने सभी अनुयायियों को सहयोग प्रदान कर इसे सफल बनाने का आदेश दिया |

ज्योति यात्रा पंजाब, बिहार, उत्तर प्रदेश, बंगाल, नेपाल आदि क्षेत्रों में होते हुए अयोध्या जी आयी , जहाँ ज्योति को प्राचीन एवं एतिहासिक सुग्रीव किला में प्रतिष्ठित किया गया है | 

सुग्रीव किला कभी एक विशाल मंदिर हुआ करता था | पर समय के साथ यहाँ एक टीला ही बचा था जहाँ बबूल और सरकंडा आदि उग आये थे | कभी-कभी कुछ पत्र-पत्रिकाओं में इसका समाचार छपता था | ऐसे ही एक बार साप्ताहिक पत्र ‘धर्मयुग’ में एक मर्मातिक सूचना के साथ आस्तिक जनता से आग्रह किया गया था कि वह आगे आकर इस स्थान की रक्षा करें | इसे पूज्य स्वामी पुरुषोत्तमाचार्य जी ने पढ़ा और पूज्य बाबा को बताया | पूज्य बाबा ने आदेश एवं आशीर्वाद दिया कि इस स्थान पर भव्य मंदिर का निर्माण होगा | पूज्य बाबा महाराज के आशीर्वाद और पूज्य स्वामी जी के अथक प्रयास से आज यहाँ वापस से भव्य एवं विशाल मंदिर का निर्माण हो चुका है |

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