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जीना इसी का नाम है -मनदीप साई

Tuesday, June 16, 2020

/ by Editor
लेखक - मनदीप साई
कुरुक्षेत्र

56 सावन की ये काया हो चुकी ये सोचते सोचते स्यावित्री अपनी जवानी के दिनों की कुछ तस्वीरें निहार रही थी।मन में जीने की वहीं उमंग।आंखे सुरमे का स्वाद चखने को बेताब।हाथो को फिर नेल पॉलिश से सजाने की चाहते।मांग में सिंदूर सजाने की भी तमन्ना।पायल की छन छन की आवाज मन ही मन मदहोश करती है।बस डर इस बात का लोग क्या कहेंगे....

दादी दादी की रट लगाए गोलू स्यावित्री के कमरे में आता है।

गोलू-दादी तुम भी चलो ना हमारे साथ शादी में।मम्मी पापा भी बोल रहे है कि तुम भी तेयार हो जाओ।सभी साथ तो चल रहे है।आप अकेले क्या करोगे घर पर रह कर।

स्यावित्री गोलू से बोलती है बेटा अब मुझे घर में ही रहना पसंद है।अब तो घर की देख बाल कर लूंगी यहां रह कर।आप लोग जा तो रहे हो।मेरा अब शादी में क्या काम।

इतने में एक आवाज आती है मां आप भी तैयार हो जाओ।जल्दी शादी में जाएंगे तो जल्दी ही आ जाएंगे।उधर गोलू जिद किए हुए बैठा था।दादी तुम नहीं चलोगी तो मै भी नहीं जाने वाला।

उधर गोलू की मां गोलू के पाप के कान में कुछ फुसफुसा रही थी।वो इस उम्र में क्या करेगी शादी में जाकर।घर पर भी तो कोई रहने वाला चाहिए।खामखा तुम बेवजह जिद पर अडे हो।जब मां जी का मन ही नहीं कर रहा तो पंकज हम चलते है।वैसे भी लेट ही हो रहे है हम।

उधर चलो दादी चलो दादी की रट लगाए गोलू अभी भी जिद किए बैठा था।उधर गोलू की मां मोनिका गोलू को आवाज लगाती है।गोलू चलो वक्त हो गया है।जिद मत करो दादी से।उधर पंकज अपनी मां स्यावित्री के कमरे में आता है।मां जी चलो ना आप भी चलो।आप घर पर अकेले क्या करोगे।स्यावित्री बेटे और पोते की जिद को मान लेती है।

हा सुन कर गोलू खुशी से नाचने लगता है।नाचते नाचते गोलू बोलता है दादी शादी में आप मेरे साथ नाचना।दादी आप अच्छे से तैयार हो जाओ उधर मां पहले ही मुंह चढाये बैठी है।

स्यावित्री कुछ देर बैठी बैठी सोचती है क्या पहनूं अब शादी के लिए।मन में अच्छे बुरे का ख्याल ना जाने क्यो स्यावित्री के मन में अा रहा था।अच्छे कपडे पहन लिए तो लोग क्या कहेंगे इस उम्र में।बेटा क्या कहेगा इस उम्र में अच्छे कपडे पहन लिए तो।गोलू तो मुझे देख कर खुश ही होगा।

56 सावन की ये काया हो चुकी ये सोचते सोचते स्यावित्री अपनी जवानी के दिनों की कुछ तस्वीरें निहार रही थी।मन में जीने की वहीं उमंग।आंखे सुरमे का स्वाद चखने को बेताब।हाथो को फिर नेल पॉलिश से सजाने की चाहते।मांग में सिंदूर सजाने की भी तमन्ना।पायल की छन छन की आवाज मन ही मन मदहोश कर रही थी।बस डर इस बात का लोग क्या कहेंगे....

स्यावित्री का दिल तो अभी भी इच्छाओं में बंधा था।दिल की अनगिनत इच्छाओं में स्यावित्री के दिल को आखिर गेर ही लिया।काया बूढ़ी हो जाती है।एक औरत लड़की से बहू ओर बहू से फिर मां और मां से फिर दादी के सफ़र में इच्छाएं शून्य हो जाती है।कभी इच्छाएं मारने लगती है कि अब इस उम्र में क्या सजना।रिश्ते बड़े हो जाते है उन्हीं बड़े रिश्तों में कहीं ना कहीं स्यावित्री का मन उलझा बैठा था।

स्यावित्री धीरे धीरे अपनी रंग बिरिंगी साड़ियों से बरी अलमारी की तरह उठ कर चल देती है।लाल पीली नीली ना जाने कितने रंग की साड़ियां थी।वहीं जवानी की रग बिरंगी नेल पॉलिश।ओर ना जाने कितने ही आभूषण जो वो कभी उन्हें पहन कर आई थी। मानो वो स्यावित्री का इंतजार ही कर रहे थे।जो उस की सुंदरता को  निल परी सी बनाते थे।मानो स्यावित्री की खुशबू पाने को बेताब बैठे हो।स्यावित्री का मन भी तो उन्हें देख कर फिर से खुद को जवा महसूस कर रहा था।उमंग का नूर हवा बन कर स्यावित्री के दिल को महका रहा था।

बिना समाज के बारे में सोचे स्यावित्री ने आज फिर अपने दिल की सुन ही ली।स्यावित्री ने लाल चटक साड़ी को आखिर चुन ही लिया।आज स्यावित्री अलमारी में रखी चीजों की बातो में  ही गई।

उधर गोलू दादी और पंकज आवाज लगाते है।दादी चलो  भी जाओ।पापा बहार इंतजार कर रहे है।स्यावित्री आवाज लगाती है तुम्हारे पापा को बोलो थोड़ा इंतजार करे।

थोड़ी देर बाद स्यावित्री तेयार होकर जब बहार निकलती है।गोलू ने पहली बार देखा था दादी को इस रूप में। लाल रंग की कातिल साड़ी।मांग में गहरा सिंदूर होंटो पर लाली।गले में चमकता हार।बालो का इकट्ठा किया हुआ जुड़ा।देख गोलू की आंखे सिर्फ एक ही बात निकली दादी क्या लग रही हो तुम।दादी तुम तो जवान लग रही हो।स्यावित्री भी जवाब देती है।अरे मैने अपने पोते के साथ नाचना भी तो है।मेरा पोता बूढ़ी औरत के साथ नाचे मुझे पसंद नहीं है।

उधर पंकज फिर आवाज देता है। मां जी जल्दी  जाओ।तभी स्यावित्री गोलू की उंगली पकड़ कर अपने अपने कमरे से निकलती है।पंकज मा  को देख देख कर बोला मां तुम बहुत सुंदर लग रही हो।इतने में मां का चहरा खिल गया जब बैठा ऐसा बोल रहा है तो मुझे जमाने की परवाह नहीं। उधर पंकज की पत्नी नेहा मां को देखती ही रह गई।ओर मन ही मन बोल रही थी इस उम्र में ये सब करने की क्या जरूर।ये उम्र सजने की नहीं होती।नेहा के होटों पर मां जी की जूठी तारीफ थी कि मां अच्छी लग रही हो।लेकिन नेहा मन ही मन जल रही थी। उधर पंकज और गोलू तारीफ पर तारीफ कर रहे थे।

थोड़ी देर बाद वो सादी वाली जगह पर  जाते है।गोलू अपने पिता पंकज का हाथ छूटा कर अपने दादा के पास के पास दौड़ कर चला जाता है।दादा जी दादा जी।अरे गोलू तुम पहुंच गए।

गोलू-हा दादा जी हम अभी पहुंचे है।देखो आज क्या दिखाने वाला हूं आपको।अच्छा क्या दिखाएगा मेरा पोता।गोलू दादा जी को हाथ पकड़ कर खींच लाता है।देखो दादा जी पहचानो उसे कोन है वो जो सामने बैठी है।अब तेज सिंह जब स्यावित्री को देखता है देखते ही पहचान जाता है।पहचाने भी क्यो ना स्यावित्री की उमंग की दौर तो पिछले 40 बरसो से तेज सिंह के हाथो में थी।गोलू अपने दादा तेज सिंह को अपनी दादी के पास लेे कर जाते है।

तेज सिंह देखते ही बोलता है। इस उम्र में ये सब करना ठीक नहीं मोत्रमा।तेरी जवानी के तीरो का घाव तो अभी भरा नहीं ओर तुम मुझ पर अपने हुसन के तीर फिर मुझे पर चलाने लगी।क्या जरूरत थी ये सब करने की।तुम तो स्यावित्री आज भी जवा लग रही हो यार।क्या इरादा है।किसी ओर के साथ भागने का इरादा है क्या।तुम तो आज भी बूढ़ी नहीं हुई यार।तुम मुझ से अब शादी में थोड़ी दूर रहना नहीं लोग मुझे कहेंगे ये इस बूढ़े की पत्नी है ये देख कर दोनो हस देते है।

स्यावित्री मजाक करती हुई कहती है।कोई तुम से अच्छा मिल गया तो चली जाऊंगी।तुम्हारे साथ 40 बरस बीत तो लिए।हा हा मुझे बता देती तुम आने वाली हो मै भी थोड़ा और सजता।

इतने में गोलू दादी का हाथ पकड़ते हुए कहता है।दादी दादी मेरे साथ नचोगी क्या।स्यावित्री तेज सिंह को जलाती हुए।हा हा क्यो नहीं जरूर।प्यारी सी मधुर ध्वनि सुन कर स्यावित्री के पैर थिरकने लगते है।सब लोग खड़े खड़े देख रहे थे।स्यावित्री ने जवानी की उमंग की तरह अपने अरमा के पंख खोल दिए। बस सब स्यावित्री की उड़ान देख रहे थे।उधर स्यावित्री गोलू के साथ नाचते नाचते अपने पति की तरह इशारा करते हुए आने को कहती है। तेज सिंह भी स्यावित्री की बातो में आकर थिरकने लगते है।उधर गोलू अपने पापा खीच लाता है।सब लोग खड़े खड़े उन्हें देख रहे थे।कुछ लोग तो होते है बाते बनाने वाले।वो बाते बना रहे थे। इस उम्र में ये करना ठीक नहीं वो करना ठीक नहीं। मगर जीने की उमंग तो देखो एक ही जगह पिता पुत्र ओर दादा दादी नाच रहे थे।

उम्र जीने के लिए मिलती है दोस्तो।लोग क्या कहेंगे ये सोचने की वजह खुल कर जियो।लोग बाते बनाते है बनाने दीजिए। खुल कर जियो।जो मन करे वो पहनो।जिंदगी जीने के लिए बनी है।लोग जलते है तो जलने दीजिए। उन की जलन में अपनी इच्छाओं को कभी ना जलने दीजिए।खुल कर जियो।क्योंकि जीना इसी का नाम है


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