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'मेरे वजूद का अक्स नया' - पूजा खत्री

Wednesday, June 17, 2020

/ by Editor
                                                  लेखिका - पूजा खत्री (लखनऊ)

किस इंतजार से मैं अब 
तक वहां था रूका हुआ

मैं जहां कल खड़ा था
वहीं आज भी ठहरा हुआ

भले बदल गया हो अब
मेरे वजूद का अक्स नया

पर उन मंजिलो का सफर
मेरा आज भी तन्हा हुआ

जाग जाग कर गुजारी 
हमने बैचेन रातें जो तेरे बिन 

कसीदे अपनी मोहब्बत के
खुद ही चांद से मैं कहता हुआ

कर ली है जब से आईने से
 दोस्ती हमने चुपचाप 

अब वो था मेरे अक्स मे 
कानों में इश्क़ कहता हुआ

महफिल वाह करती रही 
जिसे मेरे शब्द समझ के ताउम्र

दर्द थे मेरे ही वो इंतहा बस
आज सरेआम फसाना हुआ

खुद में खुद को खोकर ढूंढते हैं
 खुद ही को अब हम

हम तो वही थे पर खुद से ही 
बिछुडे हमें जमाना हुआ..


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