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इतिहास का एक लावारिस पन्ना चौरी-चौरा कांड- निखिलेश मिश्रा

Sunday, July 19, 2020

/ by Editor
                                                         लेखक -निखिलेश मिश्रा
चौरी-चौरा कांड, आजादी के आंदोलन का एक परित्यक्त अध्याय। हमारे राष्ट्रीय इतिहास का एक लावारिस पन्ना जिसकी विरासत पर किसी का कोई दावा नहीं। महात्मा गांधी ने न सिर्फ इसे 'चौरी-चौरा का अपराध' बताकर किनारा कर लिया बल्कि ये कलंक भी चौरी-चौरा के ही माथे है कि बापू को असहयोग आंदोलन इसी कांड के चलते स्थगित करना पड़ा। 

ये कथित कलंक ही है जिसके चलते चौरी-चौरा कांड का कभी कोई ठोस विश्लेषण नहीं हुआ। हमारी स्मृतियों में बस ये एक ऐसी वारदात की तरह दर्ज है जिसमें एक थाना फूंक दिया गया, थाने में मौजूद 23 पुलिसवाले जल मरे और तारीख थी 4 फरवरी, 1922। उपेक्षा की इंतेहा देखिए कि बहुत सी स्मृतियों में लंबे समये तक ये वारदात 5 फरवरी की तारीख पर भी दर्ज रही, वो भी तब जबकि इसका मुकदमा गोरखपुर जिला जेल से लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट के आखिरी फैसले तक तकरीबन एक साल तक लगातार चला। 

बहस और सुनवाई के दौरान लगातार ये बात सामने आती रही कि ये घटना कांग्रेसी वालंटियर्स के सविनय अवज्ञा आंदोलन का नतीजा थी, मगर कांग्रेसी लगातार इसे गुंडों का कृत्य बताकर पल्ला झाड़ते रहे। ये कांग्रेस का बेगानापन ही था कि चौरी-चौरा की घटना के सालों बाद तक इस कांड के प्रभावित परिवारों को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने के लाभ नहीं मिलते थे। 

1957 में तत्कालीन कलक्टर के ओएसडी ने लीगल डिपार्टमेंट को एक चिट्ठी लिखकर बताया कि 'दस्तावेजों में चौरी-चौरा की घटना के राजनीतिक होने का कोई प्रमाण नहीं है। ऐसे में बार-बार पेंशन की दरियाफ्त कर रहे लोगों को क्या जवाब दिया जाए'। चौरी-चौरा कांड में सेशन जज ने सभी 172 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई थी। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने काफी रहमदिली दिखाई और 19 मुख्य आरोपियों को ही फांसी की सजा दी, बाकी को कैद। 

लेकिन चौरी-चौरा थाने में 23 पुलिसवालों की स्मृति में तो पार्क बनाया गया मगर इन शहीदों की याद में लंबे समय तक कोई स्मारक नहीं था जो बाद में राजीव गांधी के कार्यकाल में बन सका। दरअसल 1972 तक तो चौरी-चौरा की घटना को देखने का नजरिया ही नहीं विकसित हो सका था। 50 साल बाद उसे किसी तरह राष्ट्रीय आंदोलन में गोरखपुर का योगदान के नाम पर संलग्नक की तरह शामिल किया गया। लेकिन जब किसी घटना को उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के साथ देखा जाता है तो बहुत सी और चीजें भी सामने आती हैं। इस निरपेक्ष खुदाई में तमाम मलबा और मवाद भी बाहर आता है। सवाल है कि कहीं इसी मलबे और मवाद से डरकर तो इतिहास के इस अहम अध्याय की उपेक्षा नहीं की जाती।

दरअसल अगर आप इस कांड की सतही जानकारी लेने की बजाए एक पर्त भी नीचे जाएं तो कुछ चौंकाने वाले सत्य रहस्योद्घाटित होते हैं। मसलन इस कांड में शामिल दोषी/सजायाफ्ता तमाम लोग निचली कामगार जातियों के थे और उनके अलावा बड़ी संख्या में मुसलमान। याद रखिए कि गांधी का असहयोग आंदोलन अली बंधुओं के खिलाफत आंदोलन के साथ गठबंधन में चल रहा था। मुसलमान इस आंदोलन को अपना धार्मिक फर्ज समझकर मैदान में थे। 

मगर समझ उनकी भी यही थी कि महात्मा जी का सुराज आ गया है या आने वाला है। इस कांड का एक आध चेहरा ही ऊंची जातियों से आता है, जिसमें एक अहम नाम द्वारका गोसाईं का है, हालांकि गोसाईं भी ब्राह्मणों में अत्यंत पिछड़े और आरक्षण तक के दावेदार माने जाते हैं। द्वारका गोसाईं को फांसी नहीं हुई, 14 साल का कारावास हुआ। लेकिन ब्राह्मण और दलित-पिछड़ों के बीच के बौद्धिक फर्क को आप यहां साफ रेखांकित कर पाएंगे कि जब राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्यधारा ने चौरी-चौरा के अपराधियों का परित्याग कर दिया तो अकेला द्वारका गोसांई ही ऐसा चरित्र है जो 1937 में कांग्रेस की प्रांतीय सरकार बनने के बाद खुद को राजनीतिक बंदी मानकर रिहा किये जाने की मांग करता है। द्वारका ने आगरा जेल से बाकायदा गोविंद वल्लभ पंत को पत्र लिखकर अन्य राजनीतिक बंदियों की तरह रिहा किए जाने की मांग की थी। लेकिन बाकी इस अपराध बोध में ही रहे कि उन्होंने गांधी महात्मा की इच्छा और आदर्शों के विपरीत जाकर एक वारदात को अंजाम दिया.....लिहाजा सजा काटते रहे।

दरअसल चौरी-चौरा कांड क्रांति के दलित-पिछड़े विमर्श में भी जगह मांगता है। आप अगर कांड के बाद इलाके के सवर्णों और जमींदारों की भूमिका पर गौर करेंगे तो तस्वीर थोड़ी और विचित्र बनती है। मसलन शुरुआती धरपकड़ में अंग्रेज हुकूमत ने जिन लोगों की मदद ली वो लोग इलाके के राजपूत जमींदार, उनका ब्राह्मण दीवान और एक सिख वफादार था जिसे अंग्रेज 1857 के बाद पंजाब के मजीठा से ले आए थे। एक और अहम सवाल, इस कांड में गांधी के अहिंसक आंदोलन की प्रतिछाया अधिक है या 1857 के गदर की। आप मत भूलिए कि गदर को अंजाम देने वाले ज्यादातर सिपाही पूर्वी उत्तर प्रदेश के इन इलाकों से ही थे। 

ये भी याद रखने की बात है कि गदर के दौरान भी ये इलाका उबल पड़ा था, तमाम छोटी रियासतों और जमींदारों ने बगावत का बिगुल फूंक दिया था। ऐसे तमाम छोटे-छोटे किस्से बिखरे पड़े हैं जिनमें गोरखपुर और आसपास के इलाके में अंग्रेजी अत्याचार और स्थानीय नायकों की शहादत का गुणगान है। चौरी-चौरा कांड में अहम भूमिका निभाने वाला गांव डुमरी जिस जमींदार बंधुसिंह की रियासत था उन्हें 1857 में अंग्रेजों ने सरेआम फांसी दी थी। हालांकि अंग्रेजों ने गदर की बगावत तो दबा दी लेकिन कसक कायम रही। इसके बाद गांधी जी पहली और आखिरी बार 8 फरवरी, 1921 को गोरखपुर आए। 

ये दौरा असहयोग आंदोलन के सिलसिले में ही था। याद रखिए कि गोरखपुर में गांधी को सुनने के बाद ही प्रेमचंद सरकारी मास्टर की नौकरी छोड़कर असहयोग आंदोलन के समर्थन में आ गए थे। बाले मियां के मैदान में हुई इस सभा में रघुपति सहाय फिराक भी मौजूद थे और इसके बाद ही कांग्रेस में उनकी सक्रियता बढ़ गई थी। गांधी की इस यात्रा की सालगिरह को एक साल पूरा होने में महज चार दिन बाकी थे और ये वाकया हो गया। दरअसल गांधी के इस गोरखपुर दौरे ने एक अजब माहौल बनाया। इस यात्रा के संदेश समाज के अलग-अलग स्तरों पर अलग-अलग ढंग से गए। गरीब, अनपढ़, कामगार और मजदूरों के बीच जो दरअसल छोटी जातियों से ही थे उनके लिए गांधी की यात्रा के साथ-साथ गांधी महाराज का सुराज आ गया था। आप कह सकते हैं कि सुराज आने के इस दृढ़ विश्वास ने भी कुछ असर दिखाया और बगावत के वलवले पर काबू न रहा।

दरअसल इतिहास उपेक्षा की नहीं खंगालने की चीज है। अगर आप उसकी उपेक्षा करते हैं तो वो आपकी उपेक्षा कर देगा। अगर आप उसे नष्ट करेंगे तो वो आपकी आने वाली नस्लों को नष्ट कर देगा। लिहाज चौरी-चौरा भी आज चीख-चीख कर अपने साथ इंसाफ और निरपेक्ष विश्लेषण की मांग कर रहा है। ये विश्लेषण वो तमाम सच सामने लाएगा जो रूढ़िवादी कांग्रेसी पाठ में दबकर रह गए या जिन पर जानबूझ कर पर्दा डाल दिया गया। शायद ये भी साफ हो सके कि दरअसल ये बगावत अंग्रेजों के खिलाफ थी या तत्कालीन व्यवस्था के खिलाफ। उस व्यवस्था के खिलाफ जिसका ढांचा मूलत: जमींदारी व्यवस्था पर ही खड़ा था। 

जिस बाजार में शराबबंदी और विदेशी कपड़ों की बिक्री रोकने के लिए वालंटियर्स का जत्था जा रहा था उस बाजार पर कब्जा इलाके के राजपूत जमींदार का था, जमींदार के ब्राह्मण मुनीम ने थानेदार गुप्तेश्वर सिंह को तीन दिन पहले ही बुलाकर वालंटियर्स की बदमाशियां रोकने की गुजारिश की। इतिहासकार मानते हैं कि गुप्तेश्वर सिंह ने एक फरवरी को भगवान अहीर को लाठियों से पीटा न होता तो शायद 4 फरवरी की भयावह आग लगती ही नहीं। न गुप्तेश्वर सिंह अपने 23 सहयोगियों के साथ मरते न भगवान अहीर समेत 19 लोग फांसी पर चढ़ते।

(प्रस्तुत लेख हेतु मैंने कई श्रोतो का उपयोग किया है।)

                              

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