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कविता - 'हे पवनसुत संजीवनी क्यों अब तक न लाये'

Monday, July 20, 2020

/ by Editor

                                                              शरद कुमार वर्मा 
                                                              शिक्षक, लखनऊ
धरती वासी हैं अकुलाये।।
भक्त तुम्हारे व्याकुल सारे। 
वैक्सीनेशन के है सहारे ।।

ऐसे में किसे गुहार लगायें। 
हे पवनसुत क्यों संजीवनी अब तक न लाये ।।

 क्यों हो रही इतनी देर। 
कहाँ रह गये अबकी बेर ।।
आओगे कब  पर्वत उठाये। 
हे पवनसूत संजीवनी क्यों अब तक न लाये ।।

कितने लक्ष्मण मूर्छित पड़े हैं। 
कितनों ने दम तोड़ दिये ।।
राम के आँसू सूख गये। 
क्या नाता भक्तों से छोड़ दिये ।।

विलाप हमारा क्यों न सुन पाये। 
हे पवनसुत संजीवनी क्यों अब तक न लाये ।।


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