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सावन वापस लाते है

Sunday, July 26, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi
चलो बीते सावन को वापस लाते है
जहां पड़ते थे झूले कभी बागों में
उस बाग़ को वापस लाते है

वो दोड़ना बाग़ में भरी दोपहरी बेफिक्र होकर
 ला सकें तो उस सुनहरी धूप को वापस लाते है

कुछ भी नही था मगर प्रेम बहुत था लोगो में,
तो चलो इस कलम से उस प्रेम को वापस लाते है

आज बैठी बैठी उदास किसी सूखे पेड़ के नीचे उस बचपन को याद करती हु,
गर होसके तो उस हरे पेड़ को वापस लाते है

छूट गए अपने, छूट गए गाँव आज  घूमकर गाँव सारा, पुराने दिनों को वापस लाते है
चलो बीते सावन को वापस लाते है

अब तो ना वो सावन रहा ना सावन क़ी फुहारे
फिर भी एक कोशिश करके उस ठंडी ठंडी फुहार को वापस लाते है

अब तो फीके फीके से लगते है त्यौहार सारे
गर होसके कामयाब कोशिश तो त्योहारों क़ी मिठास को वापस लाते है
चलो बीते सावन को वापस लाते है

लेखिका- सीमा तोमर
गाज़ियाबाद

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