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कविता- 'जब तुम्हारे सपने झरे थे'- विनीता मिश्रा

                                                   लेखिका- विनीता मिश्रा, लखनऊ

तुमको पता है ?
वो जो कौसानी में देखा था
पर्वत शिखर पर 
सूरज का चमकना..
सोने सा पिघल कर,
नीचे तक उतरना....
ऐसे ही शिखर पर चमकना था मुझे
वैसे ही पिघल कर बहना था मुझे

बोलो ! क्या तुमको पता है ?
क्या सचमुच पता है ?

वो तकिए पर
जब तुम्हारे सपने झरे थे
वहीं पर तो मेरे भी आंसू भरे थे
हर बूंद में एक किस्सा छुपा था
वो किस्सा, आज फिर से कहना है
तुमको पता है
मैंने कई बार कहा था
पर तुमने कहां सुना था !

जब जब हरसिंगार,
रात में हौले से खिला था
कोई सिंगार न मिला था,न हुआ था
तभी तो शांति से टूटकर
चुपके से
सुबह होते ही गिरा था!

तुमको पता है
हर हरसिंगार को ख़ुशबू सहित
मैंने ही तो चुना था
तुमने न सूंघा न छुआ था!

तुमको पता है
जब जब कुएं में 
भम से बाल्टी के गिरने की आवाज़ 
आती थी
वो मेरा दिल था
जो भरने की आस में दौड़ के गिरा था
पर भर के ऊपर कभी नहीं उठा था

वो कौसानी की चमक को
उस अंधे कुएं में
आज भी ढूंढ़ रहा है .....

हां! तुमको ये सब
कहां पता है .............!!

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