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भारत का ऐसा कोना जहां शादी से पहले मां बनना जरूरी होता है - निखिलेश मिश्रा

Sunday, August 16, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

 

निखिलेश मिश्रा, लखनऊ

अगर आप साइकिल या ट्रक से सफ़र करके सात पहाड़ी नदियों को पार करके २२ किलोमीटर की दूरी तय कर सकते हैं तो टोटोपारा में आपका स्वागत है। यहाँ रहने वाले टोटो जनजाति के लोगों ने बाहर से आने वाले लोगों को कम ही देखा है, इन लोगों तक सहायता पहुँचाने के लिए सरकारी कर्मचारी भी यह दूरी नहीं तय करते।

टोडोपाड़ा से भूटान की दूरी है महज ३ से ४ किलोमीटर। भूटान के शहर-बाजार यहां से ज्यादा करीब हैं। भारत के बड़े शहर टोडोपाड़ा से कम से कम ३० किलोमीटर की दूरी पर हैं। चूंकि रोजगार के लिए टोडो जनजाति के लोग भूटान पर निर्भर हैं। इसलिए वहां से मेहनताना भी भूटानी न्यूट्रम ही मिलता है।

टोटो जनजाति दुनिया की लुप्तप्राय जनजातियों में से एक है और यह संभवतः भारत की सबसे कम आबादी वाली जनजाति है। यह जनजाति ऐसी है जिसके ऊपर परिवार नियोजन या नसबंदी जैसे उपायों के प्रयोग पर प्रतिबंध है क्योंकि उनकी कुल संख्या सिर्फ़ ११६५ है, १९९१ की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक़ उनकी आबादी ९३६ थी लेकिन ज़िंदगी की कठिनाइयों से परेशान होकर इस जनजाति की महिलाएँ पास के शहर में जाकर फ़र्ज़ी नामों से नसबंदी करा रही हैं क्योंकि टोटोपारा में बच्चों का पेट पालना कोई आसान काम नहीं है।

भूटान की सीमा से लगे टोटोपारा गाँव में केंद्र और राज्य सरकार के विकास कार्यक्रमों की छाया तक नहीं पहुँची। पश्चिम बंगाल को असम से जोड़ने वाले हाईवे से २१ किलोमीटर दूर बसे इस गाँव तक न कोई सड़क जाती है और न ही कोई सवारी, रास्ते में पड़ने वाली नदियों को पार करने के लिए कोई पुल नहीं है।

अगर कोई व्यक्ति बीमार पड़ जाए तो उसे सबसे नज़दीकी अस्पताल ले जाने के लिए कंधों पर उठाकर २१ किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है, परिवहन के नाम पर वे ट्रक हैं जो कभी-कभी पहाड़ी नदियों से बालू निकालने के लिए वहाँ पहुँचते हैं। वैसे एक सरकारी बस भी है लेकिन वह शायद ही कभी चली हो, ऐसे में लोगों के पास स्थानीय ओझा के पास जाकर झाड़-फूँक करवाने का विकल्प ही रह जाता है।

टोटो जनजाति के लिए रोज़गार का कोई साधन नहीं है, पहले भूटान के संतरे इसी रास्ते से होते हुए बांग्लादेश भेजे जाते थे लेकिन उग्रवादियों के ख़िलाफ़ भूटानी सेना के अभियान के कारण वह भी बंद हो गया है।

टोटोपारा में बहुत कम लोग पढ़े-लिखे हैं। रोज़गार का स्थायी साधन और बुनियादी सुविधाओं के अभाव में लोग बहुत कठिन जीवन बिताते हैं, बीमारियों की चपेट आकर लोग मरते रहते हैं लेकिन उन्हें बचाने की कोई व्यवस्था नहीं है। 

भारत में टोटो जनजाति का पता लगाने वाले एक अँगरेज़ अधिकारी सैंडर्स १८८९ में जानकारी दी थी कि इस जनजाति के ६० परिवार हैं। सैंडर्स ने इस जनजाति को लगभग दो हज़ार एकड़ ज़मीन पट्टे पर दी थी ताकि वे खेती-बाड़ी करके अपनी ज़िंदगी गुज़ार सकें लेकिन १९६९ में उनके लिए संरक्षित ज़मीन को सामान्य ज़मीन में बदल दिया। इसका परिणाम ये हुआ कि बाहर से आकर वहाँ बसे नेपाली लोगों के कब्ज़े में ज़मीन चली गई। इस तरह टोटो जनजाति अपने ही घर मे बेगानी हो गई है, इस इलाक़े में काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता चेतावनी देते हैं कि अगर कुछ नहीं किया गया तो यह कबीला इतिहास के पन्नों में कहीं गुम हो जाएगा।

समाज में लड़कियों का शादी से पहले मां बनना अच्छा नही माना जाता और लोग इसे अच्छी नजर से भी नही देखते लेकिन पश्चिमी बंगाल में यह एक ऐसी जगह है जहां लड़कियों के मां बनने के बाद उनकी शादी करवायी जाती है। वहां अर्थात पश्चिमी बंगाल के जलपाईगुडी में टोटोपडा कस्बे में रहने वाली इस टोटो जनजाति में ऐसा ही रिवाज है। जहां लड़कियों के मां बनने के बाद उनकी शादी करवायी जाती है।

हालांकि इसका भी तरीका बिल्कुल अलग है। टोटो समुदाय के लड़के को जो लड़की पसंद आती है वो उसे रात के अंधेरे में लेकर भाग जाता है। फिर उसे अपने घर में रखता है। दोनों साथ-साथ रहते हैं और इस दौरान जब लड़की मां बन जाती है तब जाकर करीब सालभर बाद दोनों की शादी होती है। परंपरा के हिसाब से यहां के लड़के अपने मामा की बेटी को लेकर भागते हैं और उन्हीं से शादी करते हैं।

इस जनजाति के लोगों ने ऐसी परंपरा की नींव अपने अस्तित्व को बचाने के लिए डाली जिससे ये जनजाति बची रहे। शादी का नियम बेहद सख्त है और इसे तोड़ने वालों को शादी में ज्यादा खर्च और पूजा-पाठ करना पड़ता है।

वहीं अगर कोई लड़की मां नहीं बन पाती है और लड़के-लड़की इस संबंध से छुटकारा चाहते हैं तो इसके लिए भी कायदा है। ऐसे युगल को इस संबंध से तभी मुक्त मिलती है जब वो सूअर की बलि दे दे।

अपनी जनसंख्या बढ़ाने के लिए टोटो जनजाति के लोगों ने कड़े कायदे-कानून तो बना दिए। लेकिन इससे अब हालात बदलने की जगह बिगड़ने के अंदेशे बढ़ गए हैं। असल में इनकी खुशियों में थैलिसीमिया नाम की खतरनाक बीमारी का दीमक लग गया है। और ज्यादा डराने वाली बात ये है कि इन्हें इस बीमारी के बारे में कुछ पता नहीं है।

इसका खुलासा कोलकाता के नेताजी सुभाष चंद्र कैंसर रिसर्च सेंटर ने किया है। सेंटर ने टोटो जनजाति के लोगों के खून के नमूने लिए। इन नमूनों का जब नतीजा आया तो जानकारों के पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई। जांच में पता चला कि टोटो जनजाति के ५६ फीसदी लोग थैलीसीमिया के शिकार हैं। चूंकि इस जनजाति के लोगों ने अपनों में ही शादी के रिवाज बनाए हैं इसलिए इस बीमारी का खतरा और बढ़ जाता है।

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