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शब्द मर्यादित रहे सांस के छोर तक - पंकज त्रिपाठी

Sunday, August 16, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi
पंकज त्रिपाठी, लखनऊ

शब्द मर्यादित रहे सांस के छोर तक

मन अल्हादित हुआ तो होने दिया

इक तुम्हारा ही खोना कुछ कम न था

जो भी जाने लगा, उसको जाने दिया

ऐ जीवन इतना सरल भी नहीं

जितना लोगों से हमको बताया गया

वो है मेरे सदा जो ऐ कहते रहे

सबसे ज्यादा उन्हीं से मै सताया गया

मन कुंठित हुआ, स्वर अबोले  रहे

जो भी होता रहा उसको होने दिया

इस जीवन समर के कठिन राह में

कुछ शर ऐसे भी हम पर चलाए गए

मैं घायल हुआ था जिस बाण से

जख्म उनसे ही फिर सहलाये गए

देखता मै रहा, बस समय की घड़ी

सबको हंसाते रहे, खुद को रोने दिया

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