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ऐसी थी तुम्हारी सादगी - सोनल उमाकांत बादल

Monday, August 31, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

सोनल उमाकांत बादल (फ़रीदाबाद)

व्याकुल अँखियाँ चुप होंठों से निकली न आवाज़ 

और उसपर भी चले गये तुम होकर यूँ नाराज़, 

पहले तो न रूठते थे कभी न कोई नाराज़गी 

होगई थी फ़िदा जिसपर मैं कुछ 

ऐसी थी तुम्हारी सादगी 

थामा था तुमने हाँथ मेरा जब 

याद है दिन वो आज भी 

ये तो बता दो ख़ता हुई क्या 

बात अगर कोई ख़ास हो 

ऐसे तो चुप रहो न तुम यूँ 

न ही ऐसे नाराज़ हो, 

बदले से लगते हो अब तुम 

या बदल गये अंदाज़ 

और उसपर भी चले गये हो 

होकर के तुम यूँ नाराज़, 


कहते थे तुम हूँ मैं सबसे अलग 

और तुम सबसे कुछ ख़ास हो 

कमी नहीं ज़िंदगी में कोई 

जब तक तुम मेरे पास हो 

मैं ही बसी धड़कन में तुम्हारी 

ख़ूबसूरत सा इक एहसास हूँ 

मैं ही बसी थी दिल में तुम्हारे 

मैं ही बसी हर सांस हूँ 

टूट गये क्या सपने सारे 

या टूट गया विश्वास 

जो ऐसे तुम चले गये हो 

होकर के यूँ नाराज़, 


रोज़ ही था मिलना वो तुम्हारा 

सबकी नज़रो से छिपकर 

देख अदाएं हर - इक मेरी 

होजाते थे फ़िदा कभी मुझपर 

होगये हो अब निष्ठुर ऐसे 

देखा भी नहीं अब मुड़कर 

थी कभी मैं ग़ुरूर तुम्हारा 

जिसपर था तुम्हें बड़ा नाज़ 

फिर आज क्यूँ ऐसे चले गए हो 

होकर तुम यूँ नाराज़

और उसपर भी तुमको मैं देती रही आवाज़।

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