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दो अपरिचित परिचित से - कुसुम सिंह लता

Tuesday, August 4, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

छोड़ो आंगन आओ कानन,
कुछ   पल  संग  बिताते  हैं,
दुनियां की रफ़्तार  रोककर,
कुछ   स्मृतियाँ   भुनाते  हैं।

कर में  कर  एक दूजे का ले,
कुछ   पल  यूँ  खो  जाते  है,
मैं  वसुधा तुम बदल बनकर,
तन   मन   को   भिगोते  हैं।

प्रथम मिलन क्या याद तुम्हे है?
जब   छवि  हमारी   देखी  थी,
नयनों  ने  नयनों  से  मिलकर,
कहा    अप्सरा !    आयी   हो।

दृग  सजल  बहने  को आतुर,
अधर     गुलाबी    गीले    थे,
मिट्टी  के   दीये  की  लौ संग,
दो  अपरिचित परिचित से थे ।

बातों   ही   बातों   में  रजनी,
थपकी    देकर   ऊँघा   गयी,
भोर     की    शीतल     वायु,
न   जाने   कब  जगा   गयी।

गति   समेट अपनी  बाहों में,
जग के रिवाज़ को समझाया,
हम  खोकर  उन  रिवाज़ों में,
अपनी  ही   बातें  भूल   गये।

लेखिका - कुसुम  सिंह  लता
नई दिल्ली

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