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वक़्त का अजब दौर था - पूजा खत्री

Thursday, August 6, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi
लेखिका - पूजा खत्री (लखनऊ)


अश्क ढले नैन से,
दिल थे बेचैन से,
यादों के कारवां से मिल रहे ये नैन रे,
लब थे खामोश से धुंआ धुंआ सा समां,
उम्र सफ़र में थी और मैं वहीं था खड़ा!

नींद की आगोश में मुसाफिर हम चल रहे,
मंजिल की तलाश में पांव मेरे जल रहे,
अश्क गीत बन रहे और छंद दफन हो रहे,
पात पात झर रहा और शाख शाख जल रहा,
लुटा लुटा मैं रहा,
खबावों के इस शहर में,
उम्र सफ़र में थी और मैं वहीं था खड़ा

वक्त का अजब दौर था मोहब्बतों का शोर था,
आंखों की देख शोखियां आईना खामोश था,
बुझे-बुझे नैनों के दिये,धुंआ-धुंआ सा उठ रहा,
जल रहे थे जज़्बात कहीं, मचल मचल दिल रहा,
और लुट रहे थे हम कहीं,वक्त सफर में रहा,
शाम सहर बन गई, 
बिखर-बिखर मैं रहा,
उम्र सफ़र में थी और मैं वहीं था खड़ा!

नीर नयन में भरे ,सजदे में हम रहे,
थाम कर दिल हम उठे इक नए सफर के लिए 
शब्द फूल बन गए और लब खामोश रहे, 
मोड़ पर खड़े हम रहे और 
कारवां गुज़र गया,
उम्र सफ़र में थी और मैं वहीं था खड़ा।

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