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मैं स्वयं को ढूँढा करती हूँ - विनीता मिश्रा

Wednesday, August 19, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

विनीता मिश्रा, लखनऊ


शब्द और समय 

अद्भुत रिश्ता है 

एक मिटता नहीं 

एक रहता नहीं ।

एक सीमित है 

एक असीम है 

वो सीमित होकर अक्षर है 

वो असीमित है पर ,

ना रहता है 

ना लौटता है 

निरंतर चलता रहता है ।

वो ठहरा सा 

बस मन में पलता रहता है ।

दोनों का हाथ थामे 

कितना अद्भुत है चलना

एक स्थिरता देता है 

एक बढ़ा ले जाता है ।

जीवन के शिखरों पर 

चढ़ा ले जाता है ।

वो पैर टिकाए रहता है ,

वो हाथ फैलाए रहता है ।

इस सीमित और असीम के बीच 

मैं रोज़ समर्पण करती हूँ ,

मैं रोज़ समर्पित होती हूँ।

इस क्षणिक और अनंत के बीच 

मैं स्वयं को ढूँढा करती हूँ।

पाती हूँ - खोती हूँ 

फिर खो के फिर पा जाती हूँ।

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