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जन मानस को गुमराह न किया जाए - निखिलेश मिश्रा

Tuesday, August 11, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi


-निखिलेश मिश्रा

विभिन्न राजनैतिक दलों ने ब्राह्मण समुदाय को लेकर अपनी राजनीति तेज कर दी है। भगवान श्री परशुराम जी की प्रतिमा लगवाने के वायदा किया है बल्कि एक दल ने तो राजधानी लखनऊ में अन्य दल द्वारा वायदा की गई प्रतिमा से भी बड़ी प्रतिमा लगाने का वायदा किया है। इधर आपसभी मित्र भी शोशल मीडिया पर देख ही रहे होंगे कि आजकल चहु ओर ब्राह्मण विरोधी, ब्राह्मण प्रताड़ित, ब्राह्मण टारगेट, ब्राह्मण ही ब्राह्मण ठाकुर ही ठाकुर चल रहा हैं। 

मैने इस संदर्भ में टीवी डिबेट, शोशल मीडिया में लोगो की वाल पोस्ट, उनकी परस्पर आरोपित टिप्पणियां, उनके वक्तव्य, तीखी बहस इत्यादि देखी और सुनी, साथ ही सियासी प्रलोभनों पर भी दृष्टिपात किया।

मेरे मन मे विचार आया कि आखिर अचानक से लोगो के बीच ऐसे विचार क्यों उतपन्न हुए? क्यों सियासी दल ब्राह्मणों के नाम पर सामने आ गए? ऐसा क्या हुआ जो ब्राह्मण जाति टीवी डिबेट का हिस्सा बन गई और शोशल मीडिया पर छा गई और प्रदेश की राजनीति का मुद्दा बन गयी?

यहा उन पहलुओं पर चर्चा करना आवश्यक हो जाता है जिनके कारण अपराधी में उसकी जाति को देखा जाने लगा जैसे अबतक आतंकवादियों को धर्म विशेष से सम्बन्धित होने का आक्षेप लगाया जाता रहा है। लोग यह विचार खुद नही बनाते बल्कि बार बार एक प्रकार की घटना को देखकर उनमें उभयनिष्ठ बात को संज्ञान ले लेते है। चाहे आतंकवाद हो या अपराध।

इस संदर्भ में मेरा आंकलन इस प्रकार है।

देखा जाय तो यूपी में सब बढ़िया चल रहा था। ताबड़तोड़ एनकाउंटर्स भले ही लँगड़ा या हाफ एनकाउंटर ही क्यों ना हो, के चलते दुर्दांत अपराधियो ने स्वतः थाने में सरंडर करना शुरू कर दिया था। रहम की भीख मांग रहे थे। क्राइम ग्राफ नियंत्रित था। कुछ कुछ कार्यवाहियां होने से अपराधियो में भय भी व्याप्त था। कानून व्यवस्था चकाचक थी।

अचानक से शोशल मीडिया में आक्षेप है कि कानपुर में हुए बिकरु कांड के बाद मुठभेड़ दिखाकर मारे गए अपराधियो में उनकी जाति का ब्राह्मण होना कॉमन है। कहा जा रहा है कि वर्तमान दिनों में पोलिस का सर्विस वेपन छीन कर भागते हुए मारे गए अपराधी ब्राह्मणों के घर में पैदा होकर अपराधी के रूप में सामने आ रहे हैं जबकि इनके अलावा शेष अपराधी जीवित न्यायालय के समक्ष पेश हो रहे हैं। यहां तक कि एसटीएफ को स्पेशल ठाकुर फोर्स भी कहा जा रहा है। अपनी बात को बल देने हेतु तर्क यह भी दिया जा रहा है कि सरकार बनने के बाद शीर्ष पदों पर ठाकुर बिठाकर अधीनस्थ ब्राह्मणों को रक्खा गया था किंतु यह बात लोगो की नजर में आने के बाद इसे उलट दिया गया। तब ब्राह्मण ऊपर और ठाकुर अधीनस्थ कर दिए गए।

इसी क्रम में विभिन्न फेसबूक वाल और टिप्पणियों पर भी कुछ ज्वलन्त प्रश्न पैदा होते दिखाई दिए हैं, यथा-

(१)क्या अचानक जाति विशेष के घर से पैदा होकर अपराधी बने लोगो को टारगेट किया जा रहा है?

(२)क्या जाति विशेष लोग ही इतने शक्तिशाली है कि वे सर्विस वेपन छीनने का एकमात्र सामर्थ्य रखते है?

(३)क्या मुठभेड़ केवल इन्ही जाति विशेष से जुड़े हुए लोगो के साथ हो रही है?

(४)क्या आपके दरोगा इतने कमजोर है कि डोरी से बंधा, कमर में खुसा वेपन भी नही सम्हाल सकते लेकिन अपराधियो को सम्हालने हेतु भेज दिए जाते है?

(५)क्या यह किसी समाज को आंतरिक रूप से बांट कर धर्म विशेष को संतुष्ट करते हुए चुनावी लाभ लेने का प्रयास है जो तीन तलाक, NRC, CAA जैसे मुद्दों के कारण उपजे असन्तोष को पाटने का प्रयास है?

(६)फूलपुर समेत पूर्वांचल की बड़ी बेल्ट में रहने वाले धर्म विशेष के लोग जेल में बन्द माफिया विशेष के पेट है, जिसकारण उस पर चुनाव हेतु दबाव बनाने का प्रयास किया जा रहा है?

(७)क्या देश से न्यायपालिका का औचित्य समाप्त हो गया है?

शोशल मीडिया में उठ रहे इन तमाम बिन्दुओ पर विचार करने के बाद मेरे विचार से इस संदर्भ में कहना उचित होगा कि हम इंसान होकर भी अंतहीन टुकड़ो में बंटे हुए है। पहले हम हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई बौद्ध जैन पारसी आदि अलग अलग धर्मो में बंटे हुए है फिर इनसभी में प्रत्येक के  अंदर पुनः बंटे हुए है जैसे यदि हिन्दू है तो वह सवर्ण और दलित में, फिर इनमे भी इसीप्रकार जैसे स्वर्ण मिश्रा, गुप्ता, सिंह आदि में, फिर इनमे भी परसू के मिश्रा, ग्वाल मैदान के मिश्रा में, फिर इनके अंदर भी शांडिल्य गोत्र और विभिन्न गोत्रों में, फिर इनके अंदर भी बीस बिस्वा और बारह बिस्वा जैसे उपवर्गों में, इसी प्रकार आगे भी। हम अंतहीन रूप से विभाजित हैं। यही स्थिति उपरोक्त सभी मे अवस्थित हैं।

क्या ईसाई देशों में प्रोटेस्टेंट और कैथलिक्स नही है? क्या मुस्लिम्स देशों में सिया और सुन्नी नही है? वहां दुबई और अरब देशों में कितने दंगे सुनने में आते हैं? फिर आपसी नफरत, मनभेद और साम्प्रदायिकता भारत मे क्यों है? क्या इसलिए कि हमारे यहां की राजनीति सत्तर वर्षो से इस वर्ग विभाजन का लाभ लेकर वर्ग विशेष को लुभाकर उन्हें अपना वोट बैंक बनाती है? क्या इन्ही कारणों से बाबा साहब अम्बेडकर का वह सपना साकार नही हो पा रहा है जिसमे में सवर्ण, दलित सहित सभी वर्गों को मुख्यधारा में उनके गरिमामयी जीवन के साथ देखना चाहते थे? 

मैं नही चाहता कि भारत का समाज जो हजारो वर्षो से विभिन्न वर्गों व उपवर्गों में बंटा हुआ है, आज पुनः अनेक छोटे छोटे टुकड़ो में टूट जाये। मैं नही चाहता कि लोगो के मन मे आये समाज विरोधी विचारो को राजनीति से पोषक मिले, मैं नही चाहता कि सत्ता की मंशा के विपरीत किसी धारणा के विपरीत जनमानस में प्रसारित होता देखूँ, मैं नही चाहता कि ब्राह्मण ठाकुरो के मध्य मनभेद पैदा हो, मैं नही चाहता कि समाज मे किसी भी प्रकार का असन्तोष जन्म ले।

मेरा मानना है कि अपराधी और आतंकवादी की कोई जाति नही होती, वह सिर्फ अपराधी और आतंकवादी होता है। अपराधी का धर्म और जाति सिर्फ अपराध और आतंकवाद ही होता है किंतु स्वतन्त्र भारत की राजनीति में दिन ब दिन पसरती मनमानी विभिन्न पहलुओं पर सोचने को बाध्य कर देते हैं ताकि देश और समाज के कई छोटे छोटे टुकड़े ना हो जाये। ऐसे में अपराधियों के मध्य यदि भेदभाव किया जाता है तो वह कतई क्षम्य नही है और कानून विरुद्ध भी है।

सम्भवतः इन फैलते सन्देशो को कैश कराने के लिए शहीद मंगल पांडेय और आराध्य परशुराम जी को विभिन्न दलों ने ११% के हित वाला चुनावी मुद्दा बना दिया मानो उनके इस प्रलोभन मात्र से ही देश विश्वगुरु बन जाएगा।  वे लोगो को मूर्ख नही समझ रहे हैं, बल्कि उपरोक्त कारणों से फैलते असन्तोष में अवसर तलाश कर लाभ उठा रहे हैं।

जहां तक मैं समझता हूँ कि कोई भी राजनैतिक दल अपने कार्यकाल में कानून व्यवस्था ध्वस्त होते या असन्तोष पनपते हुए देखना नही चाहती है। कई बार सरकारो व सम्बन्धितों का ऐसा आशय नही भी होता है किन्तु फिर भी सामने खड़े लोगो पर जाने अनजाने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से विपरीत सन्देश संचारित हो ही जाता है। 

ऐसे में आवश्यक है कि ऊपर वर्णित तथ्यों पर संज्ञान लेकर उनके अनुरूप वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो ताकि जाति या धर्म का लाभ उठाकर जनमानस को राजनैतिक रूप से गुमराह न किया जा सके।

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