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ओ नन्ही चिड़िया - प्रेमलता सजवाण

Sunday, August 23, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

प्रेमलता सजवाण ( देहरादून)

वो भोली सी 

मासूम सी

खिलखिलाती

अन्जान दुनिया की 

कशमकश से।


ख्वाब देखती 

स्वप्न सजाती

बेफिक्र कल की

इंतजार करती

दुखती रग से।


क्या और कैसे

तुम्हें भरोसा दूँ?

जब पंख फैलाओगी

कि तुम रहोगी महफूज

जमाने की बदनीयती से।


ओ नन्हीं चिडि़या

तुम्हें दाना दुनका

चुनने उड़ना भी होगा

कोई पंख नोच लेगा

कोई पिंजरे मे कैद 

कर लेगा तुमको ।

और कुन्द कर देगा

तुम्हारे विचारों को।


तुम फड़फडा़ओगी

चिल्लाओगी मन ही मन

क्योंकि तुम्हारा चहचहाना

भी उन्हें लावा सा 

पिघला लगता है 

अपने कानो मे ।


तुम ढूंढोगी वो खोह

जहाँ तुम चिल्ला के

कह पाओगी अपने

मन की बात 

जहाँ तुम्हें कोई 

रोकेगा नहीं।

जहाँ तुम्हें कोई 

टोकेगा नहीं।


तब कैसे चोंच

 खोलोगी तुम?

तब कैसे कुछ 

बोलोगी तुम?

ओ नन्हीं चिडिय़ा

क्या जबाब

दोगी तुम?

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