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मुझे पसंद नहीं दिखावे की दुनियां‌ ! - वर्षा महानन्दा

Thursday, August 27, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

वर्षा महानन्दा

मुझे पसंद नहीं दिखावे की दुनियां‌ !

जहां झूठ-मूठ की दुनियादारी

हर रिश्ता एक-दूजे पर भारी

खोखले हों शब्द सारे

गिरगिट से रंग बदलते इन्सान

बिक जाते तन और ईमान

बाजार लगते मानवीय संवेदनाएं

भावनाओं का होता व्यापार

मुस्कुराहटों पर बोली लगती

पीठ पीछे खंजर चलती

हां मुझे पसंद नहीं..........

मुझे पसंद नहीं आभासी प्रेम !

जहां झूठे इश्क जताते हों

तारीफों के ताजमहल बनाते हों

जहां खेला जाता दिलों से

मन बहलाकर रौंदा जाता पैरों से

वर्ष में एक बार प्रेम का त्योहार मनाते

और आजीवन उसी प्रेम को कोसे जाते

प्यार में जीने मरने की कसमें होते थे

वही कसमें टूट बिखर कर मुंह छिपाए रोते थे

वो विश्वासघात के धुंध

वो गर्म आंसूओं के बूंद

हां, मुझे पसंद नहीं...........

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