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व्यवस्था में परिवर्तन होना चाहिए - आशुतोष राना

Wednesday, August 26, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

आशुतोष राना ( प्रसिद्ध अभिनेता व लेखक)

खूब बड़ा और बहुत पुराना, अत्यंत प्रतिष्ठित परिवार था। महिषमति साम्राज्य की तर्ज पर यह परिवार भी मातृसत्तात्मक था। इस परिवार की परम्परा थी कि सास के बाद घर की बड़ी बहू को ही सास के आसन पर परिवार के मुखिया के रूप में परिवार के पुरोहितों के द्वारा “ॐ फट्ट बहू ही अब सास है, नमस्तस्ययी नमो नमः” के महामंत्र का उच्चारण करते हुए प्रतिष्ठित कर दिया जाता। फिर रोली, कुंकुम, चंदन, चावल और गंगाजल के किंछा मारकर तिजोरी की चाबियों वाली कर्धनी बड़ी बहू की कमर में बांध दी जाती। 

‘करधन संस्कार’ के सम्पन्न होते ही घर की बड़ी बहू, बड़ी मम्मी के रूप में रूपांतरित हो जाती इसके बाद बड़ी मम्मी के सम्मान में परिवार के सभी सदस्य एक सुर में जयकारा लगाते बड़ी मम्मी ज़िंदाबाद। 

तुलसीदास जी ने कहा है-“जहाँ  सुमति तहाँ सम्पति नाना, जहाँ कुमति तहाँ बिपति निदाना।” 

लेकिन हमेशा ऐसा होता नहीं है, कभी-कभी सम्पत्ति रोग के निवारण की जगह स्वयं ही रोग और रोग का कारण हो जाती है, तो इस परिवार के साथ यही हुआ और मानस का दोहा पलटकर- “जहाँ सम्पति तंह कुमति नाना, जहाँ कुमति तहाँ बिपति निदाना।” हो गया। परिणामस्वरूप इस परिवार के वरिष्ठ सदस्य एक दूसरे की जड़ें काटने से लेकर नाक,कान काटने, एक दूसरे को लत्ती फँसाने में मास्टर हो गए, इसलिए घर में हमेशा ही कोई ना कोई चोटिल-ज़ख़्मी बना रहता, आपस में जंग लड़ते-लड़ते सदस्यों के पुरुषार्थ में ज़ंग लग गया था। 

बड़ों की इस प्रवृत्ति पर जब परिवार के किसी कनिष्ठ सदस्य के द्वारा रोष व्यक्त किया जाता तब वरिष्ठ सदस्य स्वयं में लगी ज़ंग व अपने उस कृत्य के लिए बड़ी मम्मी को ज़िम्मेदार ठहरा देते क्योंकि उस घर में सिर्फ़ बड़ी मम्मी की चलती थी- उनका वचन ही शासन था, बच्चों के अन्नप्राशन, नामकरण, मुंडन, यज्ञोपवीत, विवाह, हनिमून से लेकर अंतिम संस्कार तक के सभी निर्णय बड़ी मम्मी ही लेती थीं। 

परिवार में जब भी पद-प्रतिष्ठा, अधिकार या महत्व को लेकर कोई विवाद खड़ा होता, तब उसके निपटारे के लिए बड़ी मम्मी पूरे परिवार को गोला बनाकर बैठालतीं और विरासत में मिले सिद्ध मंत्र “आदा-पादा किसने पादा ? रामा जी की घोड़ी आयी, टांई टुंई ठुस्स गधे की लेंडी फुस्स..” का जाप करतीं और फुस्स में जिसके ऊपर भी पुरोहित जी की उँगली रूक जाती घर के उस सदस्य को विषय की गम्भीरता के अनुसार या तो पदासीन किया जाता या पदच्युत कर दिया जाता या पदोड़ा सिद्ध करके उसके सारे अधिकार छीन लिए जाते और मामला समाप्त। 

आदा-पादा मंत्र के द्वारा हर मामले का निपटारा किया जाना परिवार के युवा सदस्यों को ठीक ना लगता क्योंकि वे आधुनिक बच्चे थे उन्हें मंत्र की अपेक्षा तंत्र में अधिक विश्वास था। उनका मानना था कि इस पुरातन मंत्र आदा-पादा के चक्कर में परिवार का तंत्र गड़बड़ा गया है इसलिए उस घर से बेटियों के साथ-साथ कुछ बेटे भी विदा होने लगे, लेकिन ख़ास बात ये थी कि पराए घर में शिफ़्ट होने के बाद भी उन बेटे-बेटियों को बड़ी मम्मी के घर में दिलचस्पी बनी रहती इसलिए वे बाहर रहते हुए भी बड़ी मम्मी के निर्णयों, उनकी कार्यप्रणाली, एक ही मंत्र से सभी फ़ैसले करने पर प्रश्नचिन्ह खड़े करते रहते। 

घर में हो रहे बिखराव व स्वयं के ऊपर हो रहे प्रहारों से परेशान होकर एक दिन बड़ी मम्मी ने घोषणा की- सभी लोग अपने संयुक्त परिवार के बिखराव का कारण मुझे मानते हैं, लोगों को उस महामंत्र पर भी भरोसा नहीं रहा जो मुझे विरासत में मिला है। मुझे लगता है कि यह सिद्ध मंत्र अब अपना प्रभाव खो चुका है इसमें शक्ति नहीं बची, इस मंत्र को विरोधी तांत्रिकों द्वारा कीलित कर दिया गया है, इसलिए परिवार के कल्याण के लिए अब हमें अपनी व्यवस्था में परिवर्तन करना चाहिए। क्योंकि सास भी कभी बहू थी इसलिए अब मैं बड़ी मम्मी की ज़िम्मेदारी से मुक्त होते हुए फिर से बहू होना पसंद करूँगी। आप सभी लोग आपस में बैठकर परिवार के लिए नई बड़ी मम्मी का चुनाव कर लीजिए और घर को बिखरने से बचाइए यह कहकर उन्होंने अपनी कमर में बंधी हुई चाबी के गुच्छे वाली करधनी उतारकर परिवार के पुरोहित को पकड़ा दी। 

बड़ी मम्मी की घोषणा से घर में हड़कंप मच गया, कुछ सदस्यों ने बड़ी मम्मी की इस घोषणा का स्वागत किया तो कुछ सुन्न हो गए, क्योंकि सुन्न हुए वरिष्ठ सदस्य बहुत अच्छे से जानते थे कि बड़ी मम्मी बनना कोई हँसी खेल नहीं है जो बड़ी मम्मी होता है उसे ज़माने भर की लानत झेलनी पड़ती है, यह बहुत ज़िम्मेदारी का काम होता है। 

परिवार के सभी वरिष्ठ पंच जुड़ गए और निर्णय लिया गया कि इस बार बड़ी मम्मी का चुनाव मंत्र से नहीं तंत्र से किया जाएगा। चुनाव की प्रक्रिया निष्पक्ष हो इसके लिए परिवार के पुरोहित ने पूरे परिवार के सामने पाँच पर्चियों पर योग्य व्यक्तियों के नाम लिखे और उन पर्चियों को काँच के बर्तन में डालकर ज़ोर से हिला दिया जिससे सभी पर्चियाँ आपस में गड्डमड्ड हो जाएँ। 

पुरोहित के पीछे ज़मीन पर एक गोला बनाया गया, पंचों ने घोषणा की- पुरोहित जी ये पाँचों पर्चियाँ अपने हाथ में लेकर अपने सिर के ऊपर से पीछे की ओर फेंकेंगे इनमें से जो भी पर्ची गोले में गिरेगी उसे ही परिवार की बड़ी मम्मी का पद दिया जाएगा। 

पुरोहित जी ने आँख बंद करके पीछे की ओर पर्चियाँ उछाल दीं, एक पर्ची जो फ़र्श पर बने गोले के अंदर गिरी थी उसे उठाया, खोलकर देखा तो चकित हो गए क्योंकि उसमें बड़ी मम्मी का ही नाम लिखा था। परिवार के पुरोहित ने चाबी के गुच्छे वाली करधनी फिर से बड़ी मम्मी की कमर में बांध दी बड़ी मम्मी ज़िंदाबाद के नारों से एक बार फिर पूरा घर गूंज गया। पुरोहित ने पुलकित होते हुए उद्बोधन दिया- देखिए हमने इस बार युवाओं की माँग पर मंत्र से नहीं तंत्र से चुनाव किया, और फ़र्श पर गोला बनाकर भाग्य को भी महत्व दिया किंतु आश्चर्य इस बात का है कि व्यवस्था बदलने के बाद भी व्यक्ति नहीं बदला, गोले के बीचों बीच गिरी पर्ची में बड़ी मम्मी का नाम ही लिखा हुआ है इसका मतलब है कि ईश्वर चाहता है बड़ी मम्मी ही हमारी बड़ी मम्मी रहें इसी में परिवार का कल्याण है। 

सबके जाने के बाद बड़ी मम्मी ने पंचों और पुरोहित की पीठ थपथपाते हुए वो पाँचों पर्चियाँ अपने हाथ में ले लीं जिनपर सिर्फ़ उनका ही नाम लिखा हुआ था।

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