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ये जो मन है - अल्पना नागर

Saturday, August 1, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

मन के भीतर मन
जैसे घर के भीतर घर !
मन जानता है
भीतर की हर एक बात,
जैसे घर जानता है
एक एक कोना,
एक एक जाला..
कितनी मकड़ियां,
उधड़ी हुई पपड़ियां..!
ये जो मन है
बड़ा पेचीदा है..
कभी होता है
प्याज की परतों सा
परतदार,
कभी शलजम की
गाँठ सा गठीला
गाँठदार..!
परत हो या गाँठ
दोनों का ही
गुणधर्म है
तीखा
कसैलापन..!
मन नें पहना हुआ है
एक जमाने से
इब्नबतूता का जूता,
कितना भी रोको
टिकता ही नहीं..!
भागता है
इधर से उधर,
धुन का पक्का
हठीला है बड़ा..!
चाहे जूता हो
जापान का या हो
इब्नबतूता ब्रांड का..
कीलें कंकड़ पत्थर कीचड़
रेतीला और समतल
झेलना तो 
इसे ही है
आखिर..!
सांस तो इसकी भी
घुटती होगी !
चाहे रहता हो
सरपट भागते जूते के घर में,
मगर फिर भी
बूते से बाहर होता है मन..!
मैंने देखा है अक्सर
भागते भागते
चोटिल हुए
और अंततः
जूते से बाहर झाँकते
इत्मीनान की सांस लेते
मन के अंगूठे को..!

लेखिका - अल्पना नागर, दिल्ली
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