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राममंदिर का सपना लिए चले गए राम की शरण में

Tuesday, August 4, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

श्रीधर अग्निहोत्री

लखनऊ। अयोध्या के रामजन्मभूमि पर बनने वाले राममंदिर का षिलान्यास कार्यक्रम पांच अगस्त को होने जा रहा है। राममंदिर के लिए जहां वर्षो चली इस लड़ाई में न जाने कितने साधु संतो का योगदान और संघर्ष षामिल है। वहीं इसके  पीछे कई हिन्दूवादी नेताओं का त्याग और समर्पण शामिल रहा है। जिन्होंने इस आंदोलन में भाग लिया। पर जब यह मंगल घड़ी आ गई है तो इसे देखने के लिए वह अब इस दुनिया में नहीं हैं।


दाऊदयाल खन्ना:

1983 में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में हिन्दू जागरण मंच के तत्वावधान में एक विराट हिन्दू सम्मेलन हुआ। सम्मेलन में पूर्व मंत्री दाऊदयाल खन्ना, जो मुरादाबाद से पांच बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विधायक रहे, ने श्री राम जन्मभूमि अयोध्या, श्री कृष्ण जन्मभूमि मथुरा तथा वाराणसी स्थिति काशी विश्वनाथ मंदिर पर बनी मस्जिदों को हिन्दू स्वाभिमान के लिये चुनौती बताते हुए उनकी मुक्ति का प्रयास किये जाने की मार्मिक अपील की। खन्ना की अपील का गहरा असर हुआ और सम्मेलन में ही तीनों मन्दिरों की मुक्ति का प्रस्ताव पहली बार पारित हुआ। 


राजमाता विजय राजे सिन्धिया:

ग्वालियर राजघराने की राजमाता सिन्धिया अपने कांग्रेस विरोध के कारण ही भाजपा के साथ हो गयी थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से जबरदस्त विरोध के कारण ही राजमाता धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिन्दू परिषद से जुड़ती चली गईं। राजमाता ने कई बार विश्व हिन्दू परिषद की आर्थिक मदद की और अयोध्या आदांलन में बढ-चढकर हिस्सा लिया।


रामचन्द्र परमहंस:

1913 में जन्मे रामचन्द्र परमहंस का असली नाम रामचन्द्र तिवारी था। पूज्य परमहंस रामचन्द्र दास जी महाराज ने अयोध्या में अपनी इस घोषणा से सारे देश में सनसनी फैला दी कि श्रीराम जन्मभूमि का ताला नहीं खुला तो मैं आत्मदाह करूंगा।’ जिसका परिणाम यह हुआ कि 1 फरवरी 1986 को ही ताला खुल गया। 30 अक्टूबर 1990 की कारसेवा के समय अनेक बाधाओं को पार करते हुए अयोध्या में आये हजारों कारसेवकों का उन्होंने नेतृत्व व मार्गदर्शन भी किया।


महंत अवैद्यनाथ:

यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गुरु महंत अवैद्यनाथ  का इस आंदोलन में खास योगदान रहा। महत अवैद्यनाथ श्रीराम जन्म भूमि मुक्ति यज्ञ समिति के आजीवन अध्यक्ष रहे। महंत अवैद्यनाथ के दिगंबर अखाड़े के महंत रामचंद्र परमहंस के साथ बेहद अच्छे संबंध थे।


श्रीश चन्द्र दीक्षित:

 श्रीश चंद्र दीक्षित 1982 से लेकर 1984 तक वे उत्तर प्रदेश के डीजीपी रहे। इसके बाद 1984 में रिटायर होने के बाद विश्व हिंदू परिषद से जुड़ गए और केंद्रीय उपाध्यक्ष बन गए। श्रीश चंद्र दीक्षित राम मंदिर आंदोलन के अगली कतार के नेताओं में थे। वह श्रीराम जन्मभूमि के न्यास से भी जुड़े हुए थे। राम मंदिर आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने में उनकी खास भूमिका थी। 1989 में प्रयाग कुंभ के मौके पर अयोजित धर्मसंसद में मंदिर शिलान्यास कार्यक्रम की घोषणा की गई। 1990 में अयोध्या में कारसेवा के दौरान उनको गिरफ्तार भी किया गया था।


अशोक सिंहल:

विहिप के कई वर्षो तक अर्न्तराष्ट्रीय अध्यक्ष रहे अशोक सिंहल ने ही 1990 के दौर में अयोध्या आंदोलन का नेतृत्व किया। वह तत्कालीन सरकारों से अयोध्या विवाद को लेकर कई बार टकराए। यहां तक कि उन्होंने भाजपा सरकारों को भी नही छोडा। अयोध्या में मंदिर निर्माण को लेकर उनके तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी से भी मतभेद उभरे। 1990 में जब उन्होंने अयोध्या कूच किया तो उनके सिर पर पत्थर भी लगा। मुलायम सिंह यादव सरकार की कडी चेतावनी के बाद भी वह वेश बदलकर खेत खलिहान पार करते हुए अयोध्या पहुंचे।


विष्णु  हरि डालमिया:

विष्णु हरि डालमिया विश्व हिन्दू परिषद के वरिष्ठ सदस्य थे और वह संगठन में कई पदों पर रहे।  वह बाबरी मस्जिद ढहाए जाने मामले में सह अभियुक्त भी थे।  16 जनवरी 2019 को दिल्ली में गोल्फ लिंक स्थित उनके आवास पर उनका निधन हो गया। 


ईश्वरचंद्र चन्द्र गुप्त

पूर्व राज्यसभा सांसद ईश्वरचंद्र गुप्त कक्षा चार से संघ से जुड़े हुए हैं। वे विभाग संघ चालक, संभाग संघ चालक, प्रांत संघ चालक और क्षेत्र संघ चालक पदों पर रहे। आटोमोबाइल क्षेत्र में एक बडा नाम होने के कारण जब अयोध्या आंदोलन उफान पर था तो उन्होंने आर्थिक तौर पर विष्व हिन्दू परिषद और इस आंदोलन में रामभक्तों की खूब मदद की। रामजन्मभूमि आंदोलन के केन्द्र में रहे कानपुर  में अयोध्या जाने वाले रामभक्तों की जो टेªने यहां से होकर गुजरती थी उनके खाने पीने से लेकर रहने तक का इंतजाम ईश्वर  चन्द्र गुप्त ही किया करते थें


प्रमोद महाजन:

भाजपा के राममंदिर आंदोलन से जुड़ने के बाद भाजपा ने लालकृष्ण आडवाणी ने जब सोमनाथ से रामरथ यात्रा निकाली तो  उसमे प्रमोद महाजन का विशेष योगदान था। रथयात्रा की तिथि 25 सितम्बर (पं दीनदयाल उपाध्याय का जन्म दिन) से निकालने का निर्णय लेने वाले प्रमोद महाजन ही थें। इस यात्रा में  सिकंदर बख्त भी शामिल  थे।


कोठारी बंधु:

कोलकाता के रामकुमार कोठारी और शरद कोठारी सगे भाई थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे। कोठारी बंधुओं ने वर्ष 1990 के अयोध्या राम मंदिर आंदोलन में कार सेवा करने का फैसला किया था। तक मुलायम सरकार ने अयोध्या जाने से लोगों को रोक दिया गया था। 200 किलोमीटर का सफर पैदल ही तय किया। राम और शरद कोठारी 30 अक्टूबर को अयोध्या के विवादित परिसर में पहुंचने वाले पहले लोगों में शामिल थे। 30 अक्टूबर तक अयोध्या में लाखों कारसेवक इकट्ठा थे। बाबरी मस्जिद की गुबंद पर भगवा लहराने के बाद दोनों भाई पुलिस की फायरिंग का शिकार हुए और पुलिस की गोली से वहीं दम तोड़ दिया।


हरि दीक्षित उर्फ़ हरि  गुरु 

राम मंदिर आंदोलन का केंद्र रहे कानपुर  में बजरंगदल के पहले राष्ट्रीय संयोजक विनय कटियार के सहयोगी हरि दीक्षित इस शहर में राममंदिर आंदोलन की अलख जगाने वाले नेताओं में से एक थें।  बजरंगदल के संभाग संयोजक, प्रान्तीय संयोजक, विहिप के प्रान्तीय मन्त्री, क्षेत्रीय मन्त्री के दायित्व का निर्वहन करते हुए  मुलायम सिंह यादव सरकार के खिलाफ सडकों पर धरना प्रदर्शन  करने मे वह सदैव अग्रणी रहे। राममंदिर के लिए नौजवानों को प्रेरित करने में उनकी भूमिका को सदैव याद किया जाएगा। कानपुर के तीन विधायक सतीश  महाना, नीरज चर्तुवेदी और राकेश  सोनकर  उनके नजदीकी शिष्यों में रहे हैं । 

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