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दादा भैया से सीखा व्यावहारिक ज्ञान - आशुतोष राना

Saturday, August 29, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

आशुतोष राना ( प्रसिद्ध अभिनेता व लेखक)

बात उस समय की है जब मुझे पहला फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड मिला था और मैं पहली बार अपने नगर गाडरवारा पहुँचा। मुझे स्टेशन पर रिसीव करने के लिए मेरे इष्ट मित्रों के साथ मेरे सबसे बड़े भाई आदरणीय दादा भैया भी पहुँचे। 

अपने जीवन में मुझे विभिन्न दलों के बड़े-बड़े प्रसिद्ध राजनेताओं, साहित्यकारों, कलाकारों से लेकर प्रसिद्ध प्रवचनकारों, समाज विज्ञानियों को बहुत क़रीब से सुनने का अवसर मिला है किंतु पूरी ज़िम्मेदारी से आज यह बात कह सकता हूँ कि आदरणीय दादा भैया श्रेष्ठतम ओरटोर्स में से एक थे, वे चलते फिरते ग्रंथ थे उनके पास बैठकर मन की ग्रंथियाँ सहज ही खुल जाया करती थीं। 

दादा भैया मुझसे २१ साल बड़े थे, व्यवहार नीति और लोकाचार का निर्वाह करने में निष्णात। 

स्टेशन से बाहर निकलते ही ओपन जीप मेरे सामने लगा दी गयी और मुझसे कहा गया की मैं अगली सीट पर बैठूँ, मैं बैठने लगा.. मैंने देखा दादा भैया फुर्ती से जीप के पिछले हिस्से में साइड सीट पर बैठने लगे ! 

आदरणीय दादा भैया सिर्फ़ मेरे बड़े भाई ही नहीं थे वे नर्मादांचल के बहुत ख्यातिनाम और सम्मान्नीय व्यक्तित्व थे, उनको पीछे वाली साइड में लगी हुई सीट पर बैठता देख मैं तुरंत जीप से उतरकर खड़ा हो गया और दादा भैया से कहा- दादा आप आगे बैठिए मैं पिछली सीट पर जाता हूँ। 

दादा बोले- नही रानाजी तुम सिर्फ़ मेरे छोटे भाई नही हो, अब तुम एक ख्यातिनाम व्यक्तित्व हो यदि तुम्हारा परिवार ही इस उपलब्धि के बाद तुम्हें पीछे बैठालेगा तो ये संसार पल भर में तुम्हें अति सामान्य मानते हुए तुम्हारी उपलब्धि को नगण्य बना देगा। तुम्हें पीछे बैठाकर हम आज तो बड़े हो जाएँगे लेकिन आने वाले कल में तुम्हें छोटा करने के कारण हम बहुत छोटे हो जाएँगे। छोटे भाई, अपने हाथ से अपने ही गौरव को कभी धूमिल नही करना चाहिए, इसलिए तुम आगे बैठो।

 

मैंने कहा- दादा आपकी बात आदर और स्मरण रखने योग्य है, किंतु यदि आप जीप की पिछली सीट पर बैठे तो यही संसार मुझे अहंकारी-अशिष्ट मानते हुए पलभर में मेरे सृजन का विसर्जन कर देगा। समाज सब कुछ बर्दाश्त कर लेता है किंतु वह अशिष्टता और अहंकार को बर्दाश्त नहीं करता, यही लोग दबे हुए स्वर में कहेंगे कि देखो राना जी का अहंकार एक अवार्ड क्या मिल गया सारे शिष्टाचार भूल गए। आप ही तो हमसे कहा करते थे कि कितने ही बड़े तुर्रम खाँ क्यों ना हो जाओ लेकिन अपनो से बड़ों को देखकर उठना और झुकना सीखो। 

मेरे तर्क को सुनकर दादा बहुत स्नेह से मुस्कुराने लगे, उन्हें मुस्कुराता देख मैंने सुझाव दिया- ऐसा करते हैं दादा, आप आगे बैठें और मैं जीप ड्राइव करता हूँ। इससे हम दोनों के उद्देश्य की पूर्ति हो जाएगी। आपका आदर बना रहेगा और मेरी शिष्टता। 

आदरणीय दादा भैया शिष्टता, सरलता के महत्व को जानते थे, वे कहते थे कि सफलता प्राप्त करना सरल है किंतु इसे पचाना बहुत कठिन होता है इसलिए वे मेरे सामने ऐसी स्थितियों का निर्माण करते थे जिससे मैं उनके प्रति आदर और प्रेम के कारण सरल होने का अभ्यास करता रहूँ। 

आज दादा भैया का जन्मदिन है, वे अब इस संसार में नहीं हैं किंतु जब तक वे इस संसार में रहे उन्होंने सार्वजनिक रूप से जीवनभर मुझे छोटे भाई का स्नेह तो दिया ही किंतु मेरी सामाजिक प्रतिष्ठा के अनुरूप वे एक प्रोटोकॉल मेंटेन करते थे और चूँकि मैं सबसे छोटा था तो उनके द्वारा प्रोटोकॉल मेंटेन किए जाने से उनके क़द और पद की हानि ना हो इसलिए बिना भूले सरल से सरलतम व्यवहार करने का अभ्यास करता। 

अब सोचता हूँ तो लगता है कि दादा भैया चाहते थे कि मैं कालांतर में एक सरल व्यक्ति के रूप में जाना जाऊँ। किंतु इतने अभ्यास के बाद भी आज कभी-कभी मुझे लगता है कि सरल होना ही नहीं सरलता को समझना भी एक अत्यंत जटिल प्रक्रिया है। 

पुण्य स्मरण सहित हृदय से आपका धन्यवाद दादा, आपका जीवट आपकी विचारशीलता, आपसे मिला व्यावहारिक ज्ञान मुझे मेरे जीवन की प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदलने का साहस ही नहीं क्षमता भी देता है।

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