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तुम्हें लगाऊं मन का चंदन - विनीता मिश्रा

Tuesday, August 4, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

हे रघुनंदन !

तुम्हें लगाऊं मन का चंदन

हे रघुनंदन!  हे रघुनंदन!!

मन करता है तेरा वंदन

हे रघुनंदन!  हे रघुनंदन!!

मुझको अपनी शरण में ले लो

नहीं चाहिए यश अभिनंदन

हे रघुनंदन!  हे रघुनंदन!!

यह संसार- असार छुड़ा दो

तुमको करती तन - मन अर्पण

हे रघुनंदन!  हे रघुनंदन!!

एक विचार का समुद्र भरा है

राम नाम से करती मंथन

हे रघुनंदन!  हे रघुनंदन!!

सारा झूठ का ताना-बाना

लगता अपना महिमामंडन

हे रघुनंदन!  हे रघुनंदन!!

सत्य दिखाकर मुझको मेरा

मत करना अब इसका खंडन

हे रघुनंदन हे रघुनंदन!!

काल-व्याधि की सीमा तोड़ो

स्वीकारो  तुम मेरा वंदन

हे रघुनंदन!  हे रघुनंदन!!

सबकी तुमने पीर हरी है

मेरी बारी अब रघुनंदन

हे रघुनंदन!  हे रघुनंदन!!

अपनी अवधपुरी में बुला लो

मत भेजो तुम मुझको मधुबन

हे रघुनंदन!  हे रघुनंदन!!

सांस त्याग जो मिलन हो तुम से

कर दूं सारी अभी मैं अर्पण

हे रघुनंदन!  हे रघुनंदन !!

लेखिका - विनीता मिश्रा
लखनऊ

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