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अविचल पर्वत कभी नही मुड़ा करते - दिव्या सक्सेना

Thursday, August 6, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi
लेखिका - दिव्या सक्सेना इंदौर

उसे प्रेम हुआ,
हां बहुत ही गहराई तक
प्रेम ने उसके मन को छुआ,
बड़ी ही शिद्दत से उसने इबादत की,
प्रेम की रक्षा के खातिर न जाने कितने मंदिर मस्जिदों की चौखट पर मन्नते मांगी।

छूटे ना साथ प्रेम का कभी,
उसके लिए उसने हर मुश्किलें झेली,
ताने सुने, अथाह दर्द सहे,रुसवाईंयां झेली,
मन ही मन घुटती रही,
मगर प्यार के पहले अक्षर की तरह ही,
रह गया अधूरा प्रेम उसका भी।
छोड़ गया प्रेमी उसे 
मुंह मोड़ कर बीच रास्ते से,
अब कहने सुनने को कुछ बचा ही क्या था उससे??
जब जाने का फैसला एक तरफा ले ही लिया था उसने।

कहना कुछ भी कहां मुनासिब होता हैं?
जहां समझ का दायरा ही छोटा होता हैं।
रह गई अकेली बात यही ठान कर मन में,
कि अब मोहब्बत ना हो सकेगी इतनी कभी किसी और से जीवन में,
भ्रम टूट गया, सपने टूट गए, भरोसा ना रहा जब उसे अब किसी पर ही,
चाहे लाख समझा ले आकर अब कोई भी।

मगर एक दिन वक्त ने अपना काम किया,
उसने उसके जख्मों पर मरहम लगा ही दिया,
जब जीवनसाथी के रूप में उसे पुनः प्रेम से भेंट करा दिया,
वह दोस्त बना, प्रेमी बना,
हमसफर, हमराही, हमराज़ बना,
पति बन कर उसने उसके मन की हर गांठ को खोला,
जो बांध ली थी उसने कभी,
प्रेम में मिले दर्द के, अवसादो के पलों में।
वह सहज होने लगी, फिर से खिलखिलाने लगी,
उड़ान भरने लगी, गीत गुनगुनाने लगी,
बारिशों में भीगने लगी,
जैसे बंजर जमीन पर छा गई हो हरियाली,
प्रेम की वर्षा से फिर से वो जी उठी।

वह भी देख रहा था मुस्कुराते हुए उसे,
जैसे कोई कलाकार किसी बेरंग आकृति में,
रंग भर रहा हो,निखार रहा हो, सजा रहा हो उसे,
एक नए अंदाज में, नए रूप में फिर से।
समझ गई थी वह भी एक दिन नियति की रचना को,
मान गई थी वह भी किस्मत के खेल को।

खुश रहने लगी पाकर पुनः प्रेम वो
जीवनसाथी के रूप में,
और मान लिया उसने भी उसी को अपना संसार,
जिसके साथ रहना है उसे,
ताउम्र, एक साथ, चलना है एक राह पर,
एक दूजे के लिए भूल कर वह बीता हुआ कल
जो कभी सच था,
मगर अस्तित्वहीन हैं वो आज की स्थिति में।

क्योंकि प्रेम में " पवन " के झोंके का रुख
तो कहीं भी मुढ़ सकता हैं,
परंतु प्रेम में "अविचल पर्वत" कभी नहीं मुढा़ करते हैं।।
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