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अभिव्यक्ति की आजादी में कौंधते विचारों की स्वतंत्रता- रूपम साहू

Wednesday, September 23, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

रूपम साहू (लेखिका/कवित्री)

लिखने का सफर :

रूह का नाता है कोई,

शायद मेरी कलम से गूढ अगाह,

लेखक की संज्ञा मैं तो हूँ

मगर लेखन ही मेरे जीने की वजह।


स्वरो से मिलकर वर्ण और वर्णो से मिलकर स्वर बनाते है शब्द। विचारो की धारा मे बहे शब्द वाक्य का रूप धारण कर लेखन की कार्य शैली सुनिश्चित करते हैं । मनुष्य अपने मस्तिष्क मे तैरते विचारो को लेखन के माध्यम से दुसरो तक पहुँचाता है फिर चाहे वह किसी भी पेशे से वास्ता रखता हो । प्राचीन काल के पत्थरो पर पाई गई गढी भाषाये ये दर्शाती हैं की लेखन भी और कलाओ भांति ही प्राचीन काल मे जन्मी कला का ही एक रूप है जिसने अलग-अलग युगो से गुज़र कर कई भाषाओ मे आज क्रमागत उन्नति पाई है । समय के बदलते चक्र के साथ सामाजिक, आर्थिक, भौतिक व आधुनिक परिस्थितियो मे तमाम बदलाव के चलते लेखन की शैली भी अधिक प्रभावित होती है उदाहरण के तौर पर, आम बोलचाल मे अधिक इस्तेमाल होने वाले कुछ अंग्रेजी या उर्दु भाषा के शब्द हिंदी जगत के लेखन मे अपनी जगह बना ही लेते है । लेखन द्वारा विचारो की अभिव्यक्ति मनुष्य को किसी विशिष्ट भाषा पर पकड मजबूत करने के साथ ही दूसरो को उसके विचारो से तथा स्वय् उसे भी खुद के विचारो से रुबरू कराती है । हर पेशे मे लेखन एक मह्त्वपूर्ण अंग है । लेखन एक ऐसी कला है जिसमे न केवल साधारण शब्दो से लेकर कठिन और नवीन शब्दो का मिश्रण होता है बल्कि तार्किक प्रमाण से लेकर अपने भावो-विचारो की अभिव्यक्ति के समागम से बना लेख ज्ञान के मापदंड को विस्तृत करता है । अपनी अनुभूतियो तथा प्रज्ञता से बुद्धि मे समेटे ज्ञान को कागज पर उतारने के कार्य को एक लेखक बखूबी अंजाम देता है । लेखन का सफर सदैव एक नव शिशु की भांति शुरु होता है जो सबसे पहले पहला कदम रखना सीखता है और धीरे-धीरे कदम दर कदम जीवन की समस्त गतिविधियो मे संलग्न हो कर अनुभव ग्रहण करता है उसी प्रकार लेखन स्वर की पहली मात्रा से शुरु होकर वाक्य तक बढ कर अनुच्छेद को लांघ कर प्रकाशित बडे- बडे लेख तथा पुस्तको के रूप मे अथाह ज्ञान के भंडार मे तबदील हो जाता है । लेखन का सफर अनुठा है जैसे स्याही के बिना कलम का कोई महत्व नही है वैसे ही वैचारिक तथा भावनात्मक ज्ञान के बिना लिखने वाले का कोई भी लेख मौलिक रूप से कोई विश्वनियता नही रखता है । इस सफर मे व्यक्ति जितनी दूर तक चाहे उतनी दूरी तय कर सकता है तात्पर्य की व्यक्ति जितना चाहे इच्छानुसार उतना भावो को अभिव्यक्त करने के लिये साथ ही कल्पना की शक्ति को samaksh रखने के लिये पुर्णतया स्वतंत्र है । 

यही स्वंत्रता मौलिकता के जन्म का आधार है जो रचनाओ मे नवीनता, अपनापन और लेखक की खुद की शैली और छाप दर्शाने का अवसर प्रदान करती है । भावो की प्रबलता से पनपे विचारो तथा भाषा की शुद्धता व सरलता लेख को अति आकर्षित बनाती है । जिसमे कुछ स्वाभाविक अलंकार-युक्त वाक्य, मुहावरे, हास्य का पुट व ज़रुरत अनुसार झलकता व्यंग्य का प्रयोग रचना की उत्कृष्टता बढा कर लेख को अधिक रोचक बनाने मे अहम भूमिक अदा करता है । जो सहज ही पाठक को लेखक के विचारो से गूढ रिश्ता कायम करने मे सक्षम साबित होती है । क्योकि किसी भी लेखन का पहला उद्देश्य होता है कि उसे पढा जाये, इसलिये लेखन मे ध्यान केंद्रित करने का मतलब है पठन मे ध्यान केंद्रित करना । बच्चे, युवा, बुढे हर श्रेणी के व्यक्ति लेखन को पढकर, उसके बारे मे बात कर के ही मौखिक भाषा कौशल को विकसित करते है । कागज पर अंकित हुई रचना - कविता, कहानी, रेपोर्ट, रेसिपी, निर्देशो का समूह आदि कछ भी हो सकता है जिसकी प्रस्तुति केवल पाठक को ध्यान मे रखकर की जाती है उसे संघटन कहते है तथा उसी रचना मे इस्तेमाल हस्तलेखन, स्पेलिंग, विराम चिन्ह, सामान्य लेआउट जैसे पह्लू को शामिल करना लिप्यंतरण कह्लाता है जो लोगो के लिये पढकर समझना आसान हो । वस्तुत: एक लेखक सबसे पहले स्वयम पाठक होता है लिहाजा उनका लेखन केवल पाठक को समर्पित हो कर ही लिखा जाना चाहिये ।

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