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दिवंगत आत्माओं के तर्पण का दिन - आशुतोष राना

Thursday, September 17, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

आशुतोष राना ( प्रसिद्ध अभिनेता व लेखक)


आज पितृपक्ष का अंतिम दिन है। सनातन धर्म में पितृपक्ष के पंद्रह दिन परिवार की दिवंगत आत्माओं के तर्पण, अर्पण और स्मरण के लिए होते हैं। इन पंद्रह दिनों में हम अपने परलोक वासी पुरखों को स्मरण करते हुए उनके लिए अपने हृदय में व्याप्त श्रद्धा का तर्पण करते हैं। श्रद्धा का तर्पण ही श्राद्ध कहलाता है, माना जाता है कि श्राद्ध कर्म से परिवार की दिवंगत आत्माओं को परलोक में आनंद मिलता है, उनका परलोक सुधर जाता है। 

ये लोक-परलोक होता क्या है ? जिस लोक में हम रहते हैं उसे ‘इहिलोक’ कहा जाता है व जिसमें नही रहते उसे ‘परलोक’ कहा जाता है। 

जैसा कि भारतीय दर्शन कहता है मृत्यु शरीर की होती है आत्मा की नही, क्योंकि वह ऊर्जा है और ऊर्जा नष्ट नही होती अपितु रूपांतरित होती है। तब शरीर के अवसान के बाद हमारा आत्मा जिस लोक में जाता है चूँकि अब वो वहाँ रह रहा है इसलिए अब तक जो उसके लिए परलोक था वह लोक आत्मा के लिए इहिलोक हो जाएगा और जिसे हम इहिलोक कह रहे थे वो अब उसके लिए परलोक हो जाएगा। 

मुझे लगता है जिस परलोक को सुधारने की सलाह हमारे मनीषियों ने हमें दी है वो मूलतः हमारा यही लोक ( इहिलोक ) है जिसमें हम रहते हैं। हमारे देहांत के बाद हमारे लिए यही लोक, परलोक हो जाता है। तब हमारे जाने के बाद हमारे धर्म-कर्म, हमारे आचार-विचार, हमारे व्यक्तित्व-अस्तित्व का मूल्यांकन हमारे परिजन और हमसे जुड़े हुए लोग करते हैं। उनके द्वारा किया गया मूल्यांकन यदि सार्थक-सम्मानजनक है तब इसका अर्थ होता है की हमने अपना परलोक सुधार लिया हम स्वर्ग में हैं, और यदि उनकी दृष्टि में हमारा जीवन अर्थहीन, असंतोष का कारण है तब अर्थ निकलता है कि हमारा परलोक बिगड़ गया और हम नर्क में हैं। क्योंकि देहांत के बाद हम अपने द्वारा किए गए किसी भी कृत्य का, आपत्ति या आलोचना का जवाब दे पाने की स्थिति में नही होते।

धर्म-कर्म, आचार-विचार में शुचिता की सलाह ही हमें इसलिए दी जाती है जिससे हमारे जाने के बाद संसार हमें आत्मीयता से आदरपूर्वक स्मरण करे, हम संसार के लिए प्रेरणा का विषय हों नाकि प्रतारणा का, हमारा स्मरण उनके आनंद का कारण हो ना कि अवसाद का। 

ध्यान रखने योग्य ये है कि- हमारे जीवन की सफलता-विफलता हमारे पितरों, मित्रों, परिजनों के तारण, अर्पण, समर्पण पर आश्रित होती है। इसलिए जब तक हम जीवित हैं हमें श्रद्धापूर्वक समर्पित भाव से अपने भूलोक को सुधारने का प्रयास करना चाहिए, भूलोक के सुधरते ही गोलोक स्वमेव सुधर जाता है।

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