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राष्ट्रीय पुष्प कमल - निशा नंदिनी भारतीय

Saturday, September 19, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

निशा नंदिनी भारतीय 

तिनसुकिया, असम

       भारत का राष्ट्रीय पुष्प कमल एक पवित्र पुष्प है। पुराणों में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है। प्राचीनकाल से ही इसे भारतीय संस्कृति में शुभ का प्रतीक माना जाता है।

कमल वनस्पति जगत का एक पौधा है। जिसमें बड़े और ख़ूबसूरत फूल खिलते हैं। कमल का पौधा धीमे बहने वाले या रुके हुए पानी में उगता है। यह दलदली पौधा है। जिसकी जड़ें कम ऑक्सीजन वाली मिट्टी में ही उग सकती हैं। इसमें और जलीय कुमुदिनियों में विशेष अंतर यह कि इसकी पत्तियों पर पानी की एक बूँद भी नहीं रुकती है।  इसकी बड़ी पत्तियाँ पानी की सतह से ऊपर उठी रहती हैं। एशियाई कमल का रंग सदैव गुलाबी होता है।नीले,पीले, सफ़ेद और लाल  कमल भी होते हैं। जिन्हें कमलिनी कहा जाता हैं। कमल के बड़े आकर्षक फूलों में संतुलित रूप में अनेक पंखुड़ियाँ होती हैं।  इसकी जड़े पानी के नीचे कीचड़ में समानांतर फैली होती हैं। कमल का फूल अपनी सुंदरता के लिए जाना जाता है। कमल से भरे हुए ताल को देखना मनोहारी होता है क्‍योंकि ये तालाब की ऊपरी सतह पर खिलते हैं।

कमल की विशेषता है कि वह सूर्य उदय के साथ ही खिलता है और सूर्यास्त होते ह़ी अपनी पंखुड़ियां बंद कर लेता है। प्रेमी भंवरे को कमल के फूल बहुत आकर्षित करते हैं। भोर में जैसे ही कमल अपनी पंखुड़ियां खोलता है।भ्रमर समूह इसका मकरंद पीने को गुंजन करते हुए मंडराने लगते हैं।कई बार तो इतने मदमस्त हो जाते हैं कि भंवरों को पता ह़ी नहीं चलता की संध्या हो गयी है। सूर्य अस्त के साथ जैविक चक्र के प्रक्रिया में कमल की पंखुड़िया बंद हो जाती हैं और भँवरा उसी में फँस कर कैद हो जाता है। 

कमल के फूल को योग और अध्‍यात्‍म में एक प्रतीक के रूप में देखा जाता है। कमल के गुणों को अपने जीवन में उतार कर हम इस दुनिया में खिल सकते हैं।

योगिक शब्दावली में बोध के अलग-अलग पहलुओं को हमेशा से कमल के तरह-तरह के फूलों से तुलना की गई है। शरीर के सात मूल चक्रों के लिए कमल के सात तरह के फूलों को प्रतीक चिह्न माना गया है। 

कमल के फूल को एक प्रतीक के रूप में इसलिए चुना गया है क्योंकि जहां कहीं कीचड़ और दलदल होता है। वहां कमल का फूल बहुत अच्छी तरह से खिल कर बड़ा होता है। जीवन ऐसा ही है। हम दुनिया में कहीं भी जायें। हर किसी मन के अंदर भी हर तरह की गंदगी और कूड़ा-करकट भरा मिलेगा। अगर कोई कहे कि उसके अंदर मैल नहीं है तो फिर या तो उसने अपने अंदर नहीं झांका या फिर वह सच नहीं बोल रहा है, क्योंकि मन तो हमारे वश में नहीं है। वह सब-कुछ बटोर लेता है। जो उसके रास्ते में आता है। हमारे पास यह विकल्प होता है कि हम इसका इस्तेमाल कैसे करें। लेकिन यह विकल्प नहीं होता कि हमारा मन क्या बटोरे और क्या छोड़े। हमारे मन में जमा हो रही चीजों को ले कर हमारे पास कोई विकल्प नहीं है। हम बस यही तय कर सकते हैं कि हम किस तरह से अपने मन की जमापूंजी का इस्तेमाल करें। 

मल और कूड़ा-करकट देखने से कुछ लोगों को एलर्जी हो जाती है। उनको गंदगी और कूड़ा-करकट गवारा नहीं होता इसलिए वे खुद को इन सब चीजों से दूर ही रखते हैं। वे सिर्फ उन्हीं दो-तीन लोगों के साथ मिलते-जुलते, उठते-बैठते हैं। जिनको वे एकदम सही मानते हैं और बस यही लोग उनकी जिंदगी में रह जाते हैं। आज दुनिया में बहुत लोग ऐसा कर रहे हैं क्योंकि उनको सारी गंदी, सारी निरर्थक चीजों से एलर्जी है। वे एक कोठरी में बंद जिंदगी-सी जी रहे हैं। कुछ दूसरे तरह के लोग ऐसे हैं जो सोचते हैं कि दुनिया दलदल और कूड़े-करकट से भरी-पड़ी है तो चलो मैं भी इस कीचड़ का ही हिस्सा बन जाता हूं और फिर वे भी उसी दलदल में मिल जाते हैं। 

लेकिन एक और भी संभावना है और वह यह कि हम इस कूड़े-करकट और दलदल को खाद की तरह इस्तेमाल करें। खुद को एक कमल के फूल की तरह खिलायें। कमल के फूल ने इस गंदगी और कूड़े-करकट को किस तरह एक सुंदर और सुगंधित फूल में रूपांतरित कर दिया है। हमको एक कमल के फूल की तरह बनना है। गंदे हालात से अनछुए बाहर निकल कर कमल के फूल की तरह खिलना है। गंदे-से-गंदे हालात में होने के बावजूद हमको अपनी चरित्र की खूबसूरती और खुशबू को बरकरार रखने के काबिल बनाना है। अगर किसी के पास ऐसी कला है तो वह अपने जीवन में दलदल में बिना डूबे उससे बिल्‍कुल अछूता ऊपर  निकल जाएगा। जो व्यक्ति इस काबिलियत को पहचान कर उसको नहीं तराशता उसको यह जिंदगी जाने कितने तरीकों से तोड़-मरोड़ कर खत्म कर देती है। हर इंसान के अंदर कमल के फूल की तरह खिलने और जीने की काबिलियत होती है। योग तो  खिलते-फूलते जीवन जीने का एक वैज्ञानिक तरीका है। 

अशुद्धता से अछूता कमल का फूल, दिल और मन की पवित्रता का प्रतीक है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार कमल धन की देवी 'लक्ष्मी' का आसन है।

संस्कृत में कमल को पद्म, पंकज,  सरसिज,सरोज, जलज, जलजात, नीरज, वारिज,अंबुज, अंभोज, अरविंद, नलिन, उत्पल, पुंडरीक, तामरस, इंदीवर, कुवलय, वनज आदि भी कहा जाता है।फारसी में कमल को नीलोफ़र कहते हैं और अंग्रेजी में इंडियन लोटस या सैक्रेड लोटस, चाइनीज़ में वाटर-लिली, ईजिप्शियन या पाइथागोरियन बीन भी कहते हैं। 

कमल के पौधे के प्रत्येक भाग के अलग-अलग नाम हैं और उसका प्रत्येक भाग चिकित्सा में उपयोगी होता है। अनेक आयुर्वेदिक, एलोपैथिक और यूनानी औषधियाँ कमल के भिन्न-भिन्न भागों से बनाई जाती हैं। चीन और मलाया के निवासी भी कमल का औषधि के रूप में उपयोग करते हैं।

कमल के फूलों का विशेष उपयोग पूजा और श्रृंगार में होता है। इसके पत्तों को पत्तल के स्थान पर काम में लाया जाता है। बीजों का उपयोग अनेक औषधियों में होता है और उन्हें भूनकर मखाने बनाए जाते हैं। 

भारत की पौराणिक गाथाओं में कमल का विशेष स्थान है। पुराणों में ब्रह्मा को विष्णु की नाभि से निकले हुए कमल से उत्पन्न बताया गया है और लक्ष्मी को पद्मा, कमला और कमलासना कहा गया है। चतुर्भुज विष्णु को शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करनेवाला माना जाता है। भारतीय मंदिरों में स्थान-स्थान पर कमल के चित्र अथवा संकेत पाए जाते हैं। भगवान्‌ बुद्ध की जितनी मूर्तियाँ मिली हैं। प्राय: सभी में उन्हें कमल पर आसीन दिखाया गया है। मिस्र देश की पुस्तकों और मंदिरों की चित्रकारी में भी कमल का प्रमुख स्थान है। 

कमल की सुन्दरता मनमोहनी होती है। जिसे देखकर ही कहावत का प्रयोग होता है कि कीचड़ में ही कमल खिलता है।

इस तरह कमल सिर्फ एक पुष्प ही नहीं बल्कि हजारों गुणों की खान है। जिससे सीख लेकर हम अपने जीवन को आंतरिक और बाह्य दोनों रूपों में सुंदर बना सकते हैं। 

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