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हिन्दी दिवस पर विशेष - आशुतोष राना

Monday, September 14, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

आशुतोष राना ( प्रसिद्ध अभिनेता व लेखक)

बात तब की है जब मैं फ़र्स्ट इयर में था, हिंदी दिवस का कार्यक्रम था जिसके मुख्य अतिथि एक केंद्रीय मंत्री थे। जब भी कोई मंत्री मुख्य अतिथि होता है तब सरकारी कर्मचारियों और मंत्री जी की पार्टी के कार्यकर्ताओं में उनको प्रभावित करने की एक होड़ सी मच जाती है, अपने घर में पानी का गिलास ना उठाने वाले भी पानी की बाल्टी लिए खड़े रहते हैं मंत्री जी यदि एक गिलास पानी पीने की इच्छा व्यक्त करें तो पलक झपकते ही दस गिलास पानी उन तक पहुँच जाता है पहले गिलास पहुँचाने के चक्कर में कभी-कभी गिलास आपस में लड़ जाते हैं और पानी मंत्री जी के कुर्ता पायजामा को गीला कर देता है, परिणामस्वरूप अपनी फूँकों से उस गीले हुए कुर्ता पायजामा को सुखाने ही होड़ मच जाती है कोई उसे निचोड़ने ही लगता है, कोई निचोड़ने वाले को धक्का देकर स्वयं निचोड़ना चाहता है। इस निष्ठा प्रदर्शन की छिना-झपटी में कभी-कभी कुर्ता फट भी जाता है लेकिन उस समय मंत्री जी एक नवजात शिशु की भाँति सिर्फ़ किलकारी या कीक मारकर अपने भाव प्रदर्शित करने के सिवा कुछ नहीं कर पाते। 

उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ, मंत्री जी अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं और सरकारी कर्मचारियों के विशाल समूह से घिरे हुए कार्यक्रम स्थल पर पहुँचे, प्रत्येक व्यक्ति उनसे चिपककर चलना चाहता था जिस कारण मंत्री जी फुटबॉल के माफ़िक़ धक्के खाते हुए गोलपोस्ट अर्थात् मंच की तरफ़ बढ़ रहे थे। वे चप्पल उतारकर मंच पर चढ़ते कि अचानक उनकी निगाह मंच के नीचे पहली पंक्ति में बैठे हुए रिटायर्ड वयोवृद्ध शिक्षक पर पड़ी उन्होंने अपनी विनम्रता प्रदर्शित करने के लिए फुर्ती से रिवर्स गियर डाला और मंच पर चढ़ने की जगह उन शिक्षक की ओर मुड़ गए, मंत्री जी को मुड़ता देख उनसे चिपके हुए लोग भी बिजली की गति से मुड़े.. लेकिन उनके पीछे चल रहा भीड़ का रेला मंत्री जी के इस अप्रत्याशित मूव के लिए तैयार नहीं था वो पूरे उत्साह से आगे बढ़ रहा था तो हादसा हो गया..विपरीत दिशा में बढ़ते हुए लोग एक दूसरे पर चढ़ गए मंत्री जी को ज़ोरदार धक्का लगा वे गिर पड़े तो कुछ लोग उनसे टकराकर उनके ऊपर गिरे। तभी सरकारी कर्मचारियों को मंत्री जी की रक्षा का मौक़ा मिल गया और वे उन्हें बचाने के प्रयास में उनके ऊपर गिरे। इस उठा पटक में मंत्री जी की चप्पलें जो उन्होंने मंच का सम्मान रखने के लिए मंच के नीचे उतारीं थीं ग़ायब हो गयीं। चप्पलों के नदारत होते ही एक कार्यकर्ता को अपनी निष्ठा प्रदर्शित करने का मौक़ा मिल गया उसने भयंकर रोष से हवा में गर्जना की- चप्पल कहाँ गईं भैया की ? 

मंत्री जी की चप्पलें ग़ायब हो गयी हैं ये सुनकर विश्वविद्यालय कमेटी ने जिन व्याख्याता के हाथ में मंच संचालन की ज़िम्मेदारी सौंपी थी वे मंत्री जी को प्रभावित करने के उद्देश्य से माइक पर आकर उद्घोषणा करने लगे-

“हमारे माननीय मुख्य अतिथि जी की श्वेत-श्याम पट्टिकाओं से युक्त, रक्तवर्णी चर्म निर्मित चरण पादुकाओं में से एक, जिसे दक्षिण चरण में धारण किया जाता है दृष्टिगत नहीं हो रही है, निश्चित ही वह पदत्राण अज्ञानतावश किसी के पद प्रहार से पदकंदुक की भाँति मंचाधार के शून्य में लुप्त हो गयी होगी। मेरा आप विद्यार्थियों से निवेदन है कि वे अपने चर्म चक्षुओं से मुख्य अतिथि की चरण पादुकाओं के संधान में सहयोग प्रदान करें।” 

इतनी सुसंस्कृत भाषा में अपने व्याख्याता को बोलता सुनकर हम विद्यार्थियों को लगा कि अभिनंदन समारोह शुरू हो चुका है तो हम सभी उत्साह से तालियाँ पीटने लगे। हमें तालियाँ बजाते देख मंत्री जी चिढ़ गए और उन्होंने उद्घोषक से माइक छुड़ाकर ग़ुस्से से कहा- चप्पलों का चोरी होना मतलब शनि का उतरना होता है, लेकिन शनि महाराज सिर्फ़ उतरे नहीं रहते, वो किसी ना किसी पर चढ़ जाते हैं तो वे मुझसे उतरकर इन उद्घोषक महोदय के ऊपर चढ़ गए हैं.. मैं इनको तत्काल प्रभाव से सस्पेंड करता हूँ। इन महोदय ने सरल और सरस हिंदी भाषा को मुझे प्रभावित करने के लिए बिना किसी कारण के, विषय को समझे बिना इतना जटिल बना दिया कि हिंदी भाषी होते हुए मुझे ही हिंदी से चिढ़ हो गई। और उद्घोषक को मंच पर ही लताड़ते हुए बोले- अरे सीधे सीधे नहीं बोल सकते कि मेरी चप्पल नहीं मिल रही है उसे ढूँढने में मदद कीजिए ? हिंदी का सत्यानाश तुम्हारे जैसे ही लोगों ने किया है जो विषय-वस्तु, मौक़े की नज़ाकत को ध्यान में रखकर नहीं बोलते, बिना किसी कारण के ज़बरदस्ती साहित्यिक शब्दों को पेलने लगते हो.. भाषा कम्यूनिकेशन के लिए होती है मिस्टर कन्फ़्यूज़न के लिए नहीं। 

—— 

फिर शांत होते हुए वे हम विद्यार्थियों से बोले- हिंदी सच में बहुत सम्पन्न भाषा है इसमें हमारे हृदय में उठने वाले सभी भावों को प्रभावशाली रूप से व्यक्त कर पाने की क्षमता है आवश्यकता बस इस बात की है कि हम विषय और परिवेश के अनुसार शब्दों का चुनाव करें।

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