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आत्महत्या ही विकल्प क्यों ..? - पूजा खत्री

Wednesday, September 9, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

पूजा खत्री, लखनऊ

कभी बेइंतहा मोहब्बत के बाद धोखा, कभी कैरियर में नाकामी, और कभी अपनों से बेरूखी इन शब्दों का अपना अस्तित्व तो कुछ भी नही किंतु इन में छिपी है बेइंतहा गहराई और इस गहराई में डूब जाने वाले अक्सर गुम हो जाते है,उस अंधाधुंध चमकती दुनिया के किसी कोने मे ज़हां केवल मौत ही विकल्प नजर आती है और खो जाती है उन चमकते चेहरों की हकीकत ,जो दिन के उजाले में अक्सर हंसते मुस्कुराते नए रंगो को बिखरते रहते हैं पर कुछ पाने के हकीकत और खोने के गम की जद्दोजहद में अपनी  जिंदगी को ही दांव पर पर लगा देते है और फिर मौत को गले लगा दुनिया में अंत छोड जाते है अनेक उठते सवाल जिनका जवाब मिल भी जाए तो कोई फलसफा नहीं। अक्सर ये उन्माद की वो अवस्था है जहां दिल दिमाग पर हावी हो जाता है और जो लोग दिल से सोचते है उन्हें लगता है कि उनकी दुनिया इससे बाहर नहीं और मौत जैसे घातक कदम उठा लेते है,इस बात को भी कहीं न कहीं साबित किया जा चुका है कि भावुकता में बह कर मौत को गले लगाने वाला व्यक्ति विशेष एक पल के लिए अगर दिल की जगह दिमाग की सोच को हावी कर लेता तो आत्महत्या जैसे गुनाहों की श्रृंखला में कमी आ जाएगी। पर आखिर क्यों..? क्यों इंसान इतना मजबूर हो गया है कि भावावेश में बहकर मौत के अलावा कुछ नहीं देख पा रहा। इस भागती दुनिया में और बढ़ते अकेलेपन ने कहीं न कहीं हमें मानसिक अवसाद की उच्च सीमा रेखा तक पहुंचा दिया है,कोई भी वर्ग इससे अछूता नहीं रहा ,ऐसा तो नहीं रहा होगा कि कोई और विकल्प ही न हो जिंदगी में पर जब दिल जंग जीत गया और दिमाग हार गया परिणाम खुदकुशी।कितने अचम्भे की बात है कि जब जीने के सौ बहाने दुनिया में हो तो मरने एक फैसला कितना सही कितना गलत.....

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