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ऐसे संतों की बजह से ही गिर्राज जी सुरक्षित - आचार्य डॉ प्रदीप द्विवेदी

Friday, September 4, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi


आचार्य डॉ प्रदीप द्विवेदी 

( वरिष्ठ सम्पादक- इंडेविन टाइम्स)

दुनिया भर से प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु गोवर्धन परिक्रमा करने आते हैं। और गिर्राज प्रभु के दर्शन कर घर को निकल जाते हैं। लेकिन कुछ संत ऐसे भी हैं जो दिन रात गिर्राज जी की दिन और रात परिक्रमा करते रहते हैं। अगर कोई श्रद्धालु इनसे गलती से चाय भी पूछ ले तो ये उसे स्वीकार नहीं करते। दिन रात केवल गिर्राज परिक्रमा के साथ भजन ध्यान में व्यस्त रहते है। प्रतिदिन गिर्राज परिक्रमा कर रहे चैतन्य बाबा ने बताया की गोवर्धन मथुरा से 22 किमी० की दूरी पर स्थित है। पुराणों के अनुसार श्री गिरिराज जी को पुलस्त्य ऋषि द्रौणाचल पर्वत से ब्रज में लाये थे। दूसरी मान्यता यह भी है कि त्रेता युग में दक्षिण में जब राम सेतुबंध का कार्य चल रहा था तो हनुमान जी इस पर्वत को उत्तराखंड से ला रहे थे। लेकिन सेतु बन्ध का कार्य पूर्ण होने की देव वाणी को सुनकर हनुमान जी ने इस पर्वत को ब्रज में स्थापित कर दिया। इससे गोवर्धन पर्वत बहुत द्रवित हुए और उन्होंने हनुमान जी से कहा कि मैं श्री राम जी की सेवा और उनके चरण स्पर्श से वंचित रह गया। यह वृतांत हनुमानजी ने श्री राम जी को सुनाया तो राम जी बोले द्वापर युग में मैं इस पर्वत को धारण करुंगा एवं इसे अपना स्वरूप प्रदान करुंगा। 

बाबा आदित्य नाथ ने बताया की भगवान श्री कृष्ण बलराम जी के साथ वृन्दावन में रहकर अनेकों प्रकार की लीलाएँ कर रहे थे। उन्होंने एक दिन देखा कि वहाँ के सब गोप इन्द्र-यज्ञ करने की तैयारी कर रहे हैं। भगवान श्री कृष्ण सबके अन्तर्यामी और सर्वज्ञ हैं उनसे कोई बात छिपी नहीं थी। फ़िर भी विनयावनत होकर उन्होंने नन्दबाबा से पूछा की बाबा आप सब जे का कर रहे हो? तो नन्दबाबा और सभी ब्रजवासी बोले लाला हम इन्द्र की पूजा करवे की तैयारी कर रहे हैं। वो ही हमें अन्न, फ़ल आदि देवै। इस पर कन्हैया ने सभी ब्रजवासियों से कहा की अन्न, फ़ल और हमारी गायों को भोजन तो हमें जे गोवर्धन पर्वत देवै। तुम सब ऐसे इन्द्र की पूजा काहे कू करौ। मैं तुम सबन ते गोवर्धन महाराज की पूजा कराउंगो जो तुम्हारे सब भोजन, पकवान आदिन कू पावैगो और सबन कू आशीर्वाद भी देवैगौ।" इस पर सभी ब्रजवासी और नंदबाबा कहने लगे - लाला! हम तो पुराने समय ते ही इन्द्र कू पूजते आ रहे हैं और सभी सुखी हैं, तू काहे कू ऐसे देवता की पूजा करावै जो इन्द्र हम ते रूठ जाय और हमारे ऊपर कछु विपदा आ जावै।" तो लाला ने कहा - ’आप सब व्यर्थ की चिन्ता कू छोड़ कै मेरे गोवर्धन की पूजा करौ।" तो सभी ने गोवर्धन महाराज की पूजा की और छप्पन भोग, छत्तीस व्यंजन आदि सामग्री का भोग लगाया। भगवान श्री कृष्ण जी गोपों को विश्वास दिलाने के लिये गिरिराज पर्वत के ऊपर दूसरे विशाल रूप में प्रकट हो गये और उनकी सभी सामग्री खाने लगे। यह देख सभी ब्रजवासी बहुत प्रसन्न हो गये।

जब अभिमानी इन्द्र को पता लगा कि समस्त ब्रजवासी मेरी पूजा को बंद करके किसी और की पूजा कर रहे हैं, तो वह सभी पर बहुत ही क्रोधित हुए। इन्द्र ने तिलमिला कर प्रलय करने वाले मेघों को ब्रज पर मूसलाधार पानी बरसाने की आज्ञा दी। इन्द्र की आज्ञा पाकर सभी मेघ सम्पूर्ण ब्रज मण्डल पर प्रचण्ड गड़गड़ाहट, मूसलाधार बारिश, एवं भयंकर आँधी-तूफ़ान से सारे ब्रज का विनाश करने लगे। यह देख सभी ब्रजवासी दुखी होकर श्री कृष्ण जी से बोले - "लाला तेरे कहवे पै हमने इन्द्र की पूजा नाय की जाते वो नाराज है गयौ है और हमें भारी कष्ट पहुँचा रहौ है अब तू ही कछु उपाय कर।" श्री कृष्ण जी ने सम्पूर्ण ब्रज मण्डल की रक्षा हेतु गोवर्धन पर्वत को खेल खेल में उठा लिया एवं अपनी बायें हाथ की कनिका उंगली पर धारण कर लिया और समस्त ब्रजवासियों, गौओं को उसके नीचे एकत्रित कर लिया। श्री कृष्ण जी ने तुरन्त ही अपने सुदर्शन चक्र को सम्पूर्ण जल को सोखने के लिये आदेशित किया। श्री कृष्ण जी ने सात दिन तक गिरिराज पर्वत को उठाये रखा और सभी ब्रजवासी आनन्दपूर्वक उसकी छ्त्रछाया में सुरक्षित रहे। इससे आश्चार्यचकित इन्द्र को भगवान की ऐश्वर्यता का ज्ञान हुआ एवं वो समझ गये कि यह तो साक्षात परम परमेश्‍वर श्री कृष्ण जी हैं। इन्द्र ने भगवान से क्षमा-याचना की एवं सभी देवताओं के साथ स्तुति की।

श्याम सुन्दर बाबा ने बताया की श्रीवृन्दावन के मुकुट स्वरूप श्री गोवर्धन पर्वत श्री कृष्ण के ही स्वरूप हैं। श्री कृष्ण सखाओं सहित गोचारण हेतु नित्य यहाँ आते हैं तथा विभिन्न प्रकार की लीलायें करते हैं। प्राचीन समय से ही श्री गोवर्धन की परिक्रमा का पौराणिक महत्व है। प्रत्येक माह के शुक्लपक्ष की एकादशी से पूर्णिमा तक लाखों भक्त यहाँ की सप्तकोसी परिक्रमा पैदल एवं कुछ भक्त दंडौती (लेट कर) लगाते हैं। प्रति वर्ष गुरु पूर्णिमा (मुड़िया पूनौ) पर यहाँ की परिक्रमा लगाने का विशेष महत्व है, इस अवसर पर लाखों भक्त परिक्रमा लगाते हैं। श्री गिरिराज तलहटी समस्त गौड़ीय सम्प्रदाय अष्टछाप कवि एवं अनेक वैष्णव रसिक संतों की साधाना स्थली रही है।

श्री धाम बाबा के अनुसार गोवर्धन पर्वत का धार्मिक महत्‍व है। हिंदू धर्म में मान्‍यता है कि इसकी परिक्रमा करने से मांगी गई सभी मुरादें पूरी हो जाती हैं। यह आस्‍था का अनोखा मि‍साल है। इसीलि‍ए ति‍ल-ति‍ल घटते इस पर्वत की लोग लोट-लोट कर परि‍क्रमा पूरी करते हैं। हर दिन सैकड़ों श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं को लेकर यहां आते हैं और 21 कि‍लोमीटर के फेरे लगाते  हैं। श्रद्धाभाव का आलम यह है कि‍ सालों भर श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। लोग सर्दी, गर्मी और बरसात की परवाह कि‍ए बि‍ना ही 365 दि‍न यहां श्रद्धा-सुमन अर्पि‍त करते हैं। कहा जाता है कि‍ पांच हजार साल पहले गोवर्धन पर्वत 30 हजार मीटर ऊंचा हुआ करता था। अब इसकी ऊंचाई करीब 30 मीटर ही रह गई है। पुलस्त्य ऋषि के शाप के कारण यह धीरे-धीरे घट रहा है। इसकी परि‍क्रमा के रास्‍ते में 21 पूजनीय स्‍थल हैं। सभी का अपना इति‍हास है। यहां का माहौल देखकर ही लोग भक्‍ति ‍भावना में डूब जाते हैं। यही कारण है कि‍ तीर्थयात्रि‍यों को इस सफर का पता ही नहीं चलता और अलौकि‍क आनंद की प्राप्‍ति‍ भी हो जाती है। 21 कि‍लोमीटर की पैदल परिक्रमा करने में करीब 12 घंटे का वक्‍त लगता है, जबकि वाहन से तीन-चार घंटे में परिक्रमा पूरी हो जाती है। लोग लेटकर भी परिक्रमा करते हैं। यह बेहद कठिन होता है। लेटकर परिक्रमा पूरी करने में सात दिन का वक्‍त लगता है। 


साक्षी गोपाल जी कान वाले बाबा मंदिर:


यहां आने वाले लोग गोवर्धन पर्वत पर बने गिरिराज मंदिर में पूजा करते हैं। इसके बाद परिक्रमा के लिए चल देते हैं। गोवर्धन पर्वत से यात्रा शुरू करने के बाद पहला मंदिर यही आता है। यहां पर साक्षी गोपालजी की मूर्ति है। लोग यहां पर भगवान को नमन कर आगे बढ़ते हैं।


श्रीराधा-गोविंद मंदिर:


इस मंदिर का निर्माण भगवान श्रीकृष्‍ण के पोते वज्रनाभी ने करवाया था। यह मंदिर प्राचीन काल का बताया जाता है। यहां पर एक भव्‍य गोविंद कुंड भी है। पौराणिक कथाओं के अनुसार गिरिराज गोवर्धन की पूजा से इंद्र ने कुपित होकर ऐसी भीषण वर्षा की, जिससे ब्रज डूबने लगा और तब बालकृष्‍ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाकर डूबते ब्रज को बचाया था। 

पराजित होकर इंद्र श्रीकृष्‍ण की शरण में आए और कामधेनु के दूध से उनका अभिषेक किया। गौ के बिन्‍दू अर्थात गौ दुग्‍ध से वह स्‍थल एक कुंड के रूप में बदल गया जो कि गोविंद कुंड के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यहां आज भी गौ खुर, बंशी आदि चिन्‍हों से अंकित गिरिशिलाएं हैं।


राजस्‍थान की सीमा प्रारंभ:


गोवर्धन पर्वत की लंबाई करीब 10 किलोमीटर से ज्‍यादा है। इसका आधा हिस्‍सा यूपी में आता है तो दूसरा हिस्‍सा राजस्‍थान में। दुर्गा माता मंदिर से आगे राजस्‍थान की सीमा शुरू हो जाती है। इस मंदिर की देवी को बॉर्डर वाली माता भी कहा जाता है। परिक्रमा मार्ग पर यहां एक विशाल गेट बना हुआ है।


पूंछरी का लौठा स्थित मंदिर और छतरी:


परिक्रमा मार्ग पर पूंछरी लौठा नामक जगह पर बेहद पुराना भवन है, इसे छतरी कहते है। साधू गोविंद दास ने बताया कि यहां पर संत, साधू रहकर श्रीकृष्‍ण और गोवर्धन पर्वत का भजन करते हैं। यहां साधुओं का आना-जाना लगा रहता है। इसी जगह के पास एक मंदिर भी है।


हरजी कुंड:


परिक्रमा मार्ग पर हरजी कुंड है। इस कुंड के संचालन समिति के अध्‍यक्ष विश्‍वनाथ चौधरी ने बताया कि हरजी श्रीकृष्‍ण के सखा थे। वह कृष्‍ण के साथ गाय चराने जाया करते थे। यहां पर दोनों की लीलाएं हुई थी। इसी वजह से इस कुंड का बहुत महत्‍व है। वर्तमान में इस कुंड का पानी गंदा और मटमैला हो गया है। यहां के निवासी उमेश सिंह कहते हैं कि कुंड का रखरखाव ठीक से नहीं किया जा रहा है।


रूद्र कुंड:


यहां पर विशाल रूद्र कुंड है जहां श्रीकृष्‍ण की लीला हो चुकी है। बाद में यहां पर अवैध कब्‍जा हो गया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर अवैध कब्‍जा हटा दिया गया। अब इस कुंड का निर्माण फिर से हो रहा है।


राधाकृष्‍ण मंदिर और कलाधारी आश्रम:


यहां राधाकृष्‍ण का मंदिर है। इस मंदिर में परंपरा के तहत आश्रम संत सेवा काफी सालों से चल रहा है। करीब 70 साल पहले इसकी स्‍थापना हुई थी। हर दिन यहां पर 40 से 50 संत आते-जाते रहते हैं। यहां पर सौ गाएं पाली गई हैं। संत राघवदास कहते हैं कि हमेशा से यह आश्रम संतों की सेवा में लगा है।


ठाकुर जी बिहारीजी महाराज मंदिर:


इस मंदिर के महंत सुखदेव दास हरी वंशी वाले ने बताया कि मंदिर बेहद पुराना है और इसके स्‍थापना काल के बारे में कुछ पता नहीं है। इसे मैथिल ब्राह्मण समाज के लोग चलाते हैं।


श्री लक्ष्‍मी वेंकटेश मंदिर, गऊघाट:


इस मंदिर की स्‍थापना वर्ष 1963 में दक्षिण भारतीय परंपरा से हुई थी। यह मानसी गंगा के बीच में स्थित है। स्‍वामी राम प्रपन्‍नाचार्य ने बताया कि पूजा की परंपरा दक्षिण भारतीय है।


चूतड़ टेका मंदिर:


यह बेहद पुराना मंदिर है, जिसे अब नया रूप दे दिया गया है। इसमें हनुमान, राम, लक्ष्‍मण, सीता और राधा-कृष्‍ण की प्रतिमाएं हैं। पंडित केशवदेव शर्मा ने बताया कि जब श्रीराम को लंका जाने के समय समुद्र पर पुल की आवश्‍यकता हुई तो पत्‍थर मंगवाए गए। उस वक्‍त हनुमान जी द्रोणगिरी पर्वत के पास गए। तब द्रोणगिरी ने अपने बेटे गिरिराज (गोवर्धन पर्वत) को इस कार्य के लिए भेजा।


हनुमान जी गोवर्धन को लेकर समुद्र किनारे जा रहे थे, तभी आदेश हुआ कि अब पत्‍थरों की जरूरत नहीं है। इस बीच हनुमान जी ने गोवर्धन पर्वत को यहीं पर रख दिया। वे यहां बैठे भी थे। इसलिए इस जगह का नाम चूतड़ टेका हो गया। दूसरी कथा के अनुसार भयंकर बारिश के दौरान ब्रज को बचाने के लिए श्रीकृष्‍ण ने गोवर्धन पर्वत को उठा लिया था। इसके बाद श्रीकृष्‍ण ने लोगों के साथ


कुसुम सरोवर:-


गोवर्धन पर्वत उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के अंतर्गत एक नगर पंचायत है। गोवर्धन व इसके आसपास के क्षेत्र को ब्रज भूमि भी कहा जाता है।

यह भगवान श्री कृष्ण की लीलास्थली है। यहीं पर भगवान श्री कृष्ण ने द्वापर युग में ब्रजवासियों को इन्द्र के प्रकोप से बचाने के लिये गोवर्धन पर्वत अपनी तर्जनी अंगुली पर उठाया था। गोवर्धन पर्वत को भक्क्तजन गिरिराज जी भी कहते हैं।

सदियों से यहाँ दूर-दूर से भक्तजन गिरिराज जी की परिक्रमा करने आते रहे हैं। यह ७ कोस की परिक्रमा लगभग २१ किलोमीटर की है। मार्ग में पड़ने वाले प्रमुख स्थल आन्यौर, राधाकुंड, कुसुम सरोवर, मानसी गंगा, गोविन्द कुंड, पूंछरी का लोटा, दानघाटी इत्यादि हैं।

परिक्रमा जहाँ से शुरु होती है वहीं एक प्रसिद्ध मंदिर भी है जिसे दानघाटी मंदिर कहा जाता है। 

गोवर्धन

राधाकुण्ड से तीन मील दूर गोवर्द्धन पर्वत है। पहले यह गिरिराज 7 कोस (२१ कि·मी) में फैले हुए थे, पर अब आप धरती में समा गए हैं। यहीं कुसुम सरोवर है, जो बहुत सुंदर बना हुआ है। यहाँ वज्रनाभ के पधराए हरिदेवजी थे पर औरंगजेबी काल में वह यहाँ से चले गए। पीछे से उनके स्थान पर दूसरी मूर्ति प्रतिष्ठित की गई।

यह मंदिर बहुत सुंदर है। यहाँ श्री वज्रनाभ के ही पधराए हुए एक चकलेश्वर महादेव का मंदिर है। गिरिराज के ऊपर और आसपास गोवर्धन गाँव बसा है तथा एक मनसादेवी का मंदिर है। मानसीगंगा पर गिरिराज का मुखारविन्द है, जहाँ उनका पूजन होता है तथा आषाढ़ी पूर्णिमा तथा कार्तिक की अमावस्या को मेला लगता है।

गोवर्धन में सुरभि गाय, ऐरावत हाथी तथा एक शिला पर भगवान्‌ का चरणचिह्न है। मानसी गंगा पर जिसे भगवान्‌ ने अपने मन से उत्पन्न किया था, दीवाली के दिन जो दीपमालिका होती है, उसमें मनों घी खर्च किया जाता है, शोभा दर्शनीय होती है। यहाँ लोग दण्डौती परिक्रमा करते हैं। दण्डौती परिक्रमा इस प्रकार की जाती है कि आगे हाथ फैलाकर जमीन पर लेट जाते हैं और जहाँ तक हाथ फैलते हैं, वहाँ तक लकीर खींचकर फिर उसके आगे लेटते हैं।

इसी प्रकार लेटते-लेटते या साष्टांग दण्डवत्‌ करते-करते परिक्रमा करते हैं जो एक सप्ताह से लेकर दो सप्ताह में पूरी हो पाती है। यहाँ गोरोचन, धर्मरोचन, पापमोचन और ऋणमोचन- ये चार कुण्ड हैं तथा भरतपुर नरेश की बनवाई हुई छतिरयां तथा अन्य सुंदर इमारतें हैं।

मथुरा से डीग को जाने वाली सड़क गोवर्धन पार करके जहाँ पर निकलती है, वह स्थान दानघाटी कहलाता है। यहाँ भगवान श्री कृष्ण गोपियों से दान लिया करते थे।

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