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इन भावों का क्या दूं नाम - विनीता मिश्रा

Friday, September 11, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

विनीता मिश्रा, लखनऊ

इन भावों का क्या दूं  नाम।

मेरे भीतर - बाहर  राम।।

एक आचरण तेरा पाऊं

 दीन जनों को गले लगाऊं,

तब भी खुद को दीन बुलाऊं

कर्म मेरा हो हर  निष्काम.........

केवट बन मैं पार लगाऊं

शबरी बन मैं बेर खिलाऊं,

बना जटायू, प्राण को साधूं

राह को तकता तेरी राम ........

माथे पर पद धूल चढ़ाऊं

भरत भांति मैं शीश झुकाऊं,

 मोल भक्ति का  कुछ न चाहूं

सुमिरन तेरा,  मेरा दाम..........

चाहे  विप्र रूप कोई धारे

या केवट बन चरण पखारे,

कोई मद न मोह मुझे हो

 मांगू मैं भक्ति निष्काम ।।

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