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नूपुरो ने नई कविताएँ गढ़ी - पंकज त्रिपाठी

Monday, September 7, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

पंकज त्रिपाठी ( लखनऊ)

दो अजनबी से स्वर एक ही लय में

रात भर एक ही साज पे गुनगुनाते रहे। 

चूड़ियों की खनक, और गजरे की महक

दोनों जगते रहे और जगाते रहे.......

प्रेम के धधकते हवन कुंड में

जब सांसों की समिधाऐ पडी़। 

अग्नि प्रज्वलित हुई ताप बढ़ने लगा

नूपुरो ने नई कविताएँ  गढ़ी। 

दो अजनबी से अधर एक ही वेग में

इक दूजे को एक अंदाज में सहलाते रहे। 

दो अजनबी से स्वर एक ही लय में

रात भर एक ही साज पे गुनगुनाते रहे.......

चांदनी सा वदन मेरे आगोश में

बर्फ की मानिंद जब पिघलने लगा। 

मेरे तन का रूधिर बड़ी वेग से

मेरे तन में हिलोरें भरने लगा। 

दो अजनबी सी धड़कने एक ही वेग में

इक दूजे को एक अंदाज में धड़काते रहे। 

दो अजनबी से स्वर एक ही लय में

रात भर एक ही साज पे गुनगुनाते रहे......

इक अजब सा नशा मन में छाता रहा

बिन स्वरों के ही मैं गीत गाता रहा। 

खुद की खतायें  स्वयं में संस्कारित लगी

खुद को खोता रहा, उनको पाता रहा। 

दो अजनबी एक ही जाल में

खुद को छुड़ाते रहे, खुद को उलझाते रहे। 

दो अजनबी से स्वर एक ही लय में

रात भर एक ही साज पे गुनगुनाते रहे.......

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