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अध्यात्मिक दर्शन - पूजा खत्री

Thursday, September 10, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

 


पूजा खत्री, लखनऊ

एक व्यक्ति किसी तीर्थ यात्रा पर जा रहा था,मार्ग में कोई महात्मा मिल गया। महात्मा ने यात्रियों से पूछा, भाई कहां जा रहे हो, यात्री ने तीर्थ का नाम बता दिया महात्मा ने पूछा, उस तीर्थ स्थान का क्या फायदा है, यात्री ने उत्तर दिया, इससे मनुष्य जीवन मिलता है, फिर महात्मा ने पूछा कि मनुष्य जन्म का क्या लाभ है, यात्री ने कहा मनुष्य जन्म में भक्ति की जा सकती है। महात्मा ने कहा अरे, भले मानस अभी भी तो तू मनुष्य है जो तीर्थ यात्रा करके दोबारा मनुष्य जन्म और प्रभु भक्ति करना चाहता है तो इस जन्म में क्यों नहीं कर लेता, इस बात का यात्री के मन पर गहरा प्रभाव पड़ा और वह तन मन से प्रभु भक्ति में लग गया।

         हर धर्म ग्रंथ में इस बात का जिक्र होता आया है कि चौरासी लाख योनियों के बाद मनुष्य जन्म मिलता है और केवल इसी जन्म में हम अपने आवागमन से मुक्ति पा सकते हैं पर कैसे...? क्या दान पुण्य करके, क्या पूजा-पाठ, व्रत हवन करके, क्या मंदिर-मस्जिद, गुरुद्वारा में सिर नीवा कर क्या ये ही तरीके हैं प्रभु भक्ति के।यह कैसे तय हो कि इन तरीकों को करने से मनुष्य सफल हो जाएगा और हम आवागमन के चक्कर से मुक्ति पाकर परमात्मा में लीन हो जाएंगे।आत्मा को परमात्मा का पति परमेश्वर कहा गया है,जब से सृष्टि बनी है,आत्मा प्रीतम से बिछड़ी हुई है,अपने पति परमेश्वर से मिलने के लिए, किंतु अहम सवाल आत्मा का स्वरूप क्या है और किस प्रकार से यह दुनिया में भटकती है..?

          मां के गर्भ में आने के बाद से ही आत्मा विभिन्न धर्मों का जामा पहन कर अपने को भूल जाती है और मनुष्य जीवन में होने वाले कर्मों का सिलसिला शुरू हो जाता है मनुष्य कर्म और भोग दोनों करता है इन कर्मों को दो भागों में विभाजित किया गया है अच्छे कर्म और बुरे कर्म।पूजा- पाठ, हवन, दूसरों की मदद,मां-बाप की सेवा जो कि अच्छे कर्म  कहे जाते हैं जिसके भोग स्वरूप दोबारा मनुष्य जन्म मिलता है अथवा देवता योनि की प्राप्ति,राजा युधिष्ठिर जिंदगी भर सत्य पर चलते रहे और अपने कर्मों के आधार पर धर्मराज युधिष्ठिर कहलाए गये।

जीव- हत्या, दूसरों को सताना, चोरी- ठगी आदि बुरे कर्मों के अंतर्गत हैं जिसके भोग-स्वरूप कीड़े-मकोड़े, पक्षी, पेड़- पौधे, वनस्पति आदि निचली योनियां प्राप्त होती हैं, यही प्रक्रिया दुनिया के आवागमन की लगी रहती है।

        कर्मों के आधार पर जन्म को पांच वर्गों में विभाजित किया गया है जिसमें मनुष्य जन्म को चौरासी लाख योनियों की सर्वोत्तम और आखिरी सीढ़ी कहा गया है तो अगला सवाल कि इनमें मुक्ति क्या है और क्या कोई ऐसा भी रास्ता है जो आवागमन से बचा जा सके। संतो ने मनुष्य को प्रभु का घर कहा है और ये कहते हुए इस बात पर जोर दिया है कि परमात्मा मंदिरों और जंगलों पहाड़ों में नहीं रहता और बानी तो यहां तक कहती है 

" इस पौड़ी ते जो नर चुके सो आए जाए दुःख पाइंदा" 

   अर्थात मनुष्य जीवन दुर्लभ अवसर है जिसने इस जन्म में भक्ति नहीं की तो आवागमन से मुक्ति पाना मुश्किल है पूजा करते समय माथे पर तिलक लगाना इस बात को प्रतीक है कि परमात्मा इस शरीर के तीसरे तेल या शिव नेत्र जो कि दो आंखों के मध्य में है, विराजमान है वहीं से आत्मा का रूहानी सफर शुरू होता है और यह ज्ञान बिना पूर्ण गुरु की प्राप्ति के संभव नहीं। 

     विभिन्न धर्म ग्रंथों में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कबीर जी का दोहा "गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागूं पाय, बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो मिलाय"क्या केवल पूर्ण गुरु का मिलना ही मुक्ति की कसौटी है तो कबीर जी कहते हैं, नहीं, शिष्य की कसौटी भी ऐसी चाहिए" गुरु तो ऐसा चाहिए जो शिष्य का कछु ना ले, शिष्य तो ऐसा चाहिए कि गुरु को सब कुछ दे" अष्टावक्र ने राजा जनक के मात्र समर्पण भाव से ही सत्य की उपलब्धता क्षणिक देर में करवा दी जिसका इतिहास गवाह है पर अनेक धर्म ग्रंथों के पाठ पठन के बाद भी हम इस मिथ्या संसार में स्वयं को शरीर मात्र मानकर जीवन का निर्वाह कर रहे हैं और सत्य से कोसों दूर है।स्वयं को ऊंचा दिखाने की होड़ में अनेकों अच्छे- बुरे कर्मों की खेती कर रहे हैं और धर्म और आस्था के नाम पर एक दूसरे को नीचा दिखाने में लगे हैं, बलि के नाम पर पशुओं की कुर्बानियां दे रहे हैं, मंदिर-मस्जिद की एक ईंट की टूट पर (मालिक) ईश्वर के बनाए जीवों को काटने के लिए तैयार हैं और हम सोचते हैं कि हम चौरासी लाख योनियों के आवागमन से मुक्त हो जाएंगे, परमात्मा को बाहरी कर्मकांड और गंगा स्नान द्वारा पा लेंगे अगर मनुष्य जीवन इसीलिए मिला होता तो अनेक सूफी संत,महात्मा बुद्ध, जीजस, गुर नानक देव और कबीर सूरदास इन सब ने भक्ति मार्ग न पकड़ा होता है और न ही मीरा राधा ने प्रेम मार्ग उस शाश्वत सत्य की तलाश में।

     बहुत सारे बुद्धि जीवी इस बात को मिथ्या ठहराते हैं न पिछला जाना न अगला देखा पर अगर कुछ न देखा न जाना तो विभिन्न धर्म ग्रंथों का उद्भव ही क्यूं..हर धर्म में सत्य की परख हुई,मनन हुआ, चिंतन हुआ, विचारक हुए 

पांडुलिपियों का होना ही निशानी है हकीकत की, पर गूंगा कैसे बताए मिठाई की मिठास और भूखा कैसे बताए भूख का एहसास,परख करनी होगी तभी ज्ञान होगा और जिज्ञासा ही ज्ञान की जननी बनेगी।

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