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अमर हो गए वीर पुत्र - रीता पंकज शुक्ला "सौम्या"

Sunday, September 13, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi


रीता पंकज शुक्ला "सौम्या" लखनवी

सीमा पर तुम खड़े रहे,चौड़ा अपना सीना ताने।

हांथो में बंदूख लिए,आंखों में धधकते अंगारे ।

सीमा पर करने को प्रहार हिम्मत न हुई दुश्मन की कभी।

छुप कर उसने घात किया, पीठ पर उसने प्रहार किया।

अंतिम क्षण तक युद्ध किया,

फिर माँ की गोद में विश्राम लिया।

हृदय की धङकन बंद होने तक निकल रही थी ,भारत माता की जयघोष तुम्हारे।

बंदूख न छूटि हांथो से,वर्दी भी रही तन से चिपकी।

खून चढ़ा कर चरणों मे,माँ को अंतिम प्रणाम किया।

अमर हो गए वीर पुत्र,भारत माँ के लिए हुए शहीद।

पैरों से चल कर गए सीमा पर,लौट के आए कंधों पर।

देख तुम्हे हुई नम आँखे जब दी जा रही थी तुम्हे अंतिम विदाई।

मात -पिता निढ़ाल खड़े थे,छूट गई आज हांथो की लाठी।

फिर भी गर्व से खड़े हुए भारत माता की जय बोल रहे।

कर्ज अदा किया उन्होंने धरती को बीटा सौप दिया।

दुख असहनीय पीड़ा अविस्वर्णीय फिर भी "रोना आया"नही।

आँखे छलक कर रुक जाती, शहीद का अपमान न कर पाती।

भीड़ भी प्रणाम कर रही उसको,भारत माता की जय बोल रही।

फक्र उन्हें बेटे पर था उसकी   चौड़ी छाती पर था।

सीमा से वो कभी डिगा नही,पीछे वो कभी हटा नही।

मौत तो सभी को आती है,पर तिरंगा कहाँ उढाती है।

आज भारत माँ ने प्यार किया, अपना सम्मान उढा दिया।

सोच तुम्हारे सौभाग्य  को ,किसी को नही"रोना आया"।

सीमा पर तुम खड़े रहे चौड़ा अपना सीना ताने।

हांथो में बंदूख लिए, आँखों मे धधकते अंगारे ।

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