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अविरल व्यक्तित्व और दर्शन के प्रतिबिंब महात्मा गांधी - आयुष मिश्रा

Friday, September 18, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

 

आयुष मिश्रा (लेखक - संस्थापक युवान फाउंडेशन)

२० वीं शताब्दी के शुरुआत से आधुनिक भारत के इतिहास तक शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो महात्मा गांधी के विचार, व्यक्तित्व, जीवन दर्शन के असाधारण चुंबकत्व से आकर्षित ना हुआ हो । दक्षिण अफ्रीका से शुरू हुई अन्याय और नस्लभेद के खिलाफ लड़ाई भारत के संपूर्ण आजादी की रूपरेखा तैयार करने में कारगर सिद्ध हुई । गांधी के प्रशंसक हर जाति धर्म और राष्ट्र में है बहुत सी सरकारी व्यवस्थाएं भारत सहित अन्य देशों की गांधी दर्शन द्वारा संचालित होती है , संविधानों में गांधी और उनके विचारों की अलग ही परिधि है । अन्याय के खिलाफ प्रथम लड़ाई में गांधी के सहयोगी रहे हेनरी पोलाक ने भी गांधी को असाधारण व्यक्तित्व और प्रभावशाली विचार माना दक्षिण अफ्रीका में गांधी पर लिखा । गांधी पर लिखने वालों में गोपाल कृष्ण गोखले, अल्बर्ट आइंस्टाइन, सर्वपल्ली राधाकृष्णन, डॉ राजेंद्र प्रसाद आदि बहुत से देशी और विदेशी विभूतियां शामिल हैं। बीसवीं सदी के महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन गांधी के बारे में लिखते हैं "गांधी एक ऐसा व्यक्तित्व है जिसकी राजनीति दूसरे को अपना कायल कर देने की शक्ति पर आधारित थी" । गांधी एक योद्धा के तौर पर प्रयोगात्मक विचारों को अपना हमेशा हथियार बनाए , लोगों को एकजुट कर उनके जिम्मेदारियों और एकता में निहित शक्तियों से रूबरू करवाएं । गांधी विनम्र, उदारवादी, शालीन और प्रयोग का उपहास करने वाले व्यक्ति थे जिन्होंने यूरोपीय कायरता का सामना मानवीय मूल्यों से करवाया । इतिहास के पन्नों में विभूतियों की टिप्पणियों पर नजर डालें तो यही प्रतीत होता है गांधी एक महान अविरल व्यक्तित्व  है जिनका दर्शन भारत सहित अन्य राष्ट्र में मानवीय मूल्यों को जन्म जन्मांतर तक जागृत करता रहेगा । अहिंसा के उपासक महात्मा गांधी ने मां को दी प्रतिज्ञा का सदैव पालन किया खासतौर पर उन दिनों में भी जब भारत से बाहर रहने पर वर्तमान वातावरण में मांसाहार की जरूरत अधिक थी । 1915 में सूट बूट में लौटे गांधी भारत के किसान को देखकर खादी की स्वनिर्मित धोती पहनकर आजादी की संपूर्ण लड़ाई लड़ने का निश्चय किया उनका यह वक्तव्य उनके संकल्प निष्ठा को प्रदर्शित करता है फिर चाहे वह चर्चिल के सामने हो या अन्य किसी विदेशी हुकमाराम के । उनका संकल्प इतना दृढ़ था कि गोलमेज सम्मेलन से लेकर इंग्लैंड में शाही भोज तक खादी की एक धोती ही उनकी पहचान और भारतीयों की आवाज बनी। .... 

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