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अधजल गगरी छलकत जाय - पंकज त्रिपाठी

Wednesday, September 9, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

पंकज त्रिपाठी, लखनऊ

समाज में खुद को स्थापित करने के दो तरीके होते है, एक तरीका खुद को सामर्थ्यवान बनाओ, और खुद की पहचान

स्थापित करो, और दूसरा किसी पहले से स्थापित चीज या इंसान को समाज में गलत रुप दे दो । पहला तरीका बहुत कठिन और प्रक्रिया लंबी है, मगर दूसरा तरीका आज समाज में बहुत प्रचलित हैं । खासकर उस समुदाय, उस समाज में सबसेज्यादा जो असल में वो है ही नहीं जो खुद को समझते हैं। 

ऐसे ही सामाज में कुछ ताजे ताजे सामाजिक चिंतको से आप

सभी रूबरू होते रहते होगें, जो अपनी मूल जड़ों पर ही प्रहार करने में अपना हुनर समझते हैं। खुद को विज्ञानवादी कहते है,  जिस धर्म और जाति में पैदा हुए, उस धर्म में उनको आस्था नही, अपने समुदाय अपनी जाति पर अभिमान नहीं, खुद को ही उपेक्षित, और निम्न करार देना, कैसी बुद्धिमत्ता है? हमारी

समझ से परेय है । ऐसे लोग हमारे वेदों, शास्त्रों, उपनिषदों, महाकाव्यों, को मिथक मानते हैं, जो हमारे देश की महान संस्कृति महान ज्ञान को कपोल कल्पना मानते हैं, ऐसे लोगों को मेरी सलाह है रामसेतु के बारे में जो रिपोर्ट नासा ने दी है, उसी को पढ़ लो। इंडोनेशिया एक मुस्लिम बहुल आबादी वाला देश है , उसके आयुंग नदी के चटटानो पर रामायण कालीन चित्र ही देख लो। 

असल में दलितों में एक ऐसा तबका जो मुख्यधारा से निकल कर वामपंथ की तरफ मुड़ गया, और अपने समाज को नई तरह से सवारने में जुट गए। वामपंथी एक विचारधारा है जो कट्टर मुस्लिम विचारधारा से भी खतरनाक विचारधारा है, हमारे समाज को, संस्कृति को, मुस्लिमो से उनकी विचारधारा से इतना खतरा नहीं, क्योंकि वो एक खुली किताब है, मगर ऐ वामपंथी पटाखे जो हमारे आसपास फूट रहे हैं, बहुत खतरनाक है । अब बहुत लोग यह सोच रहे होंगे हमनें शीर्षक का नाम ऐसा क्यों रखा?

हम एक शुद्ध, शाकाहारी,सात्विक ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए, पारिवारिक पूजा पाठ, विधि विधान, रहन सहन, का मेरे 

दिमाग पर असर होता था, कुछ प्रशन दिमाग में हिलोरे लेते थे और वही दफन हो जाते । यह उन दिनों की बात है जब हम 

बालिग होने की दहलीज पर थे, उस वक्त हमें सौभाग्य कहूँ या 

दुर्भाग्य हमें वामपंथी साहित्य पढ़ने का बहुत अवसर प्राप्त हुआ।  और उस साहित्य को पढ़ने का असर यह हुआ, कि हमारे जैसा इंसान जो अपनी जड़ो से अपने धर्म और संस्कृति

में विश्वास करता था, कुछ समय के लिए नास्तिक हो गया । 

स्नातक में चूकि इतिहास हमारा विषय था, और हमारा रुचिकर विषय था, उसमें भी वामपंथियों ने अपनी जड़ो को अच्छे से 

स्थापित कर रखा है ।  उस वक्त तक मै मानसिक रूप से भी बालिग हो गया था, इतिहास पढ़ने के बाद मालूम हुआ, ईसाई, और मुस्लिम विचारधारा से खतरनाक विचारधारा वामपंथी विचारधारा है । इस देश में इस विचारधारा का पनपने को हमारे

पूर्वजों ने बहुत हल्के में लिया, शुरुआत में वामपंथी हमारे संस्कृति, धर्म, की व्याख्या थोड़ा नरम तरीके से करते थे । जब इनको रोका नहीं गया तो यह लोग मनमाने ढंग से हमारे शास्त्रों, 

उपनिषदों, महाकाव्यों, वेदों पर मनमानी टीका टिप्पणी करने लगे। और सच पूछा जाये तो इनको कुछ भी नहीं आता है, ऐ केवल नाम के विद्धान होते हैं अगर आप डिवेट के लिए इनको चुनौती दे दो तो दुम दबाकर भागते नज़र आएगें। ऐसे बुद्धिजीवी, ऐसे सामाजिक चिंतक, अपने कम पढ़े लिखे, या औसत पढें लिखें,  आरक्षण से पोषित होकर सरकारी अनुदान पाकर अंधों में काना राजा बनकर उभरते है।अपने समाज का वो अंबेडकर बनकर उभरता है, और कुछ दिन के बाद मसीहा घोषित हो जाता है।  मगर सच पूछा जाय तो ऐसे लोग मानसिक रूप से अपंग होते हैं, फिर खुद को श्रेष्ठ साबित करने के लिए वो उस विषय वस्तु पर भी टिप्पणी करने लगते हैं जिनके विषय में उनका ज्ञान शून्य होता है । फिर ऐसे लोग खुद को तुलसीदास, बालमीकि, कालीदास से भी महान लेखक कवि और उपदेशक मानने लगते हैं और मौका पाते ही उनपर भी उंगली उठाने में संकोच नहीं करते । ऐसे लोग फिर निषादराज गुह की तुलना भगवान राम से करने लगते हैं, और यह कहकर कि निषादराज के वंशज अमेरिका में थे कहकर 

इतिहासविद् भी बन जाएगे। मगर आप इनको संवाद के लिए चुनौती दो,बात की पुष्टि के लिए साक्ष्य की मांग करो, तो सुप्तावस्था को प्राप्त हो जाऐगे। ये तर्क नहीं करते,कुतर्क करते हैं। और हाँ सारी बुराई सारी सडांध, सारा अत्याचार अन्याय इनको सनातन धर्म में दिखेगा, अन्य कोई धर्म चाहे इनको मार दे, बलात्कार कर दे, भगा दे, चुप रहेगें, एक आवाज नहीं निकलेगी, ऐ होता है वामपंथियों का चरित्र, बड़े बड़े वामपंथियों को आप जानते होगे, जैसे रवीश, बरखा, प्रसून, कन्हैया, मगर 

कुछ पटाखे भी होतें है, जो हमारे आसपास होते हैं, नेटवर्किंग के मामले में ऐ लोग अव्वल होते हैं । अभी बहुत लोग इस, लेख को पढ़ने के बाद हमारे समाज के लोग ही इसको नजरंदाज कर देगे, कमेंट देना तो दूर शायद लाइक भी न करें, क्योंकि हम जिस समाज से है वहाँ सब अपने आपको चाणक्य, ब्राह्मस्त्र, प्रक्षेपास्त्र समझते हैं, उनके बीच में हम ही बस देशी कट्टे की भांति है । मगर वो अपने समाज में अंधों में काना राजा है, मेरा ज्ञान भले उनसे अधिक हो, मगर मेरा सम्मान उनसे कम है, इसलिए उनकी अधजल गगरी भी छलक रही है। यहाँ पर डाक्टर वसीम बरेलवी की गजल की पहली पंक्ति याद आती है......

ज़रा सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता है 

समुंदरों ही के लहजे में बात करता है 

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