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खबरों की खिड़की पर - अल्पना नागर

Wednesday, September 9, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi


अल्पना नागर, नई दिल्ली

खबरों की खिड़की पर

बैठा है एक कौआ

एकदम निठल्ला..!

दिनभर निहारता है राह

कि मिल जाये एक अदना खबर,

इन दिनों बेहद व्यस्त है

इतना कि रात में भी चैन नहीं......

छिल गया है बेचारा गला

कांव कांव की अनथक ध्वनि से

लेकिन फिर भी जारी है

कार्य के प्रति उसकी लगन

और अदम्य उत्साह..!

उत्साह इतना कि

पंजो में जैसे लग गई हो

कोई स्थाई 'स्प्रिंग' !!

बार बार उछलता है अपनी जगह पर

आँखों में आ जाती है 

सुनहरी चमक/

जब भी दिखती है कोई ख़बर..

हमने पाला हुआ है उसे

हमारी ही खिड़की पर रहता है वो

इन दिनों अहर्निश..

हमें मधुर लगती है

उसकी परिश्रम में डूबी ध्वनि

जैसे यही है..बस यही है अब

राष्ट्रीय संगीत !

हम मन ही मन मुग्ध है

तालियां पीटते हैं 

उसकी उतार चढ़ाव भरी

निरंतर ध्वनि पर/

सारा ध्यान केंद्रित है

बस उसी पर..

कुछ और अब कहाँ सुनने वाला है !

अति उत्साह में जब बिगड़ने लगता है

उसके 'स्प्रिंग' लगे पंजों का संतुलन/

हम दौड़कर जाते हैं

खिड़की की ओर

उसे प्यार से पुचकारते हैं

'कहीं लगी तो नहीं जनाब !'/

कहकर बिठा देते हैं पुनः वहीं

खबरों की खिड़की पर

यथोचित सम्मान के साथ/

फिर जाते हैं हम अपनी खाने की टेबल पर

बिछाते हैं एक सभ्य कपड़ा

परोसते हैं एक एक कर

कौए द्वारा आयातित खबरें 

अभी पेट नहीं भरा लेकिन

कुछ तो कमी है!!

हम देखते हैं पुनः 

उसी खिड़की की तरफ

याचना भरी दृष्टि लिए/

कौआ बहुत समझदार है

वो ले आता है फटाफट

चटपटे अचार का एक डिब्बा/

अपने नाजुक पंजों में भरकर

हम लेते हैं बलैया

उसके अदम्य साहस और उत्साह की/

फिर पुनः व्यस्त हो जाते हैं

अचार का आनंद लेने में

अचार के खत्म होने के बाद भी

चूसते रहते हैं

गुठलियां और छिलका/

उसमें अनुभूत होता है 'परमानंद' !

खिड़की का एकछत्र मालिक

कौआ दूर से देखता है

समस्त परिदृश्य/

उसने लगा दिया है एक बोर्ड

खिड़की के बाहर

'ताजा हवा का प्रवेश निषिद्ध है..'!

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  1. बहुत बेहतरीन काव्य रचना

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