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परिंदे झाँकते हैं... - शैलेन्द्र श्रीवास्तव

Friday, October 23, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

शैलेन्द्र श्रीवास्तव ( प्रसिद्ध अभिनेता व लेखक)

परिंदे झाँकते हैं...

खिड़कियों से, रौशनदानों से

कभी तोता कभी मैना

कभी कौआ कभी कोयल

कबूतर और गौरैया की शक्लों में

अगर कोई नहीं दिखता...

तो घर में घुस भी जाते हैं

कभी बिजली के पंखों से 

वो लड़ घायल भी होते हैं

मगर डरते नहीं हैं वो

संभलते हैं, फिर घुसते हैं

टहलते हैं वो हो बेफ़िक्र

जैसे उनका ही घर हो...

कभी हैरान दिखते हैं

कभी वो चौंक जाते हैं!

वो शायद सोचते हैं...

उनके वृक्ष, जंगल घोंसले

ग़ायब कहाँ हो गए?

और उनकी जगह...

ईंट, पत्थर की इमारतें 

उग आईं कहाँ से?

बहुत हतप्रभ हैं!!!

मैं अक्सर सोचता हूँ...

 छल हमने किया है

अतिक्रमण किया है

परिंदे हमारे घरों में नहीं

हम उनके घरों में घुस आए हैं।

परिंदो को भी घोंसला चाहिये

ये कब हम सोचेंगे?

घर उनकी भी ज़रूरत है

ये कब हम समझेंगे?

कब...? कब...? कब...???

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