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पूजा आदि कर्म में आसन का महत्त्व - आचार्य डॉ प्रदीप द्विवेदी

Saturday, October 24, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

 


आचार्य डॉ प्रदीप द्विवेदी 

( वरिष्ठ संपादक- इंडेविन टाइम्स समाचार पत्र)

धार्मिक कार्यों में पूजन या जप के दौरान आसन का प्रयोग सदियों से चला आ रहा है। पूजा-पाठ घर में हो या किसी देव मंदिर में, बैठकर पूजन करने के लिए हम आसन का उपयोग करते हैं। शास्त्रों में हर प्रकार की कामना के लिए अलग-अलग आसन बताए गए हैं। लेकिन नित्य पूजा करते समय कैसा आसन होना चाहिए, यह बात आज भी शायद बहुत कम लोग ही जानते हैं। क्या बिना आसन पूजा हम कर सकते हैं या आसन बिछाए बिना क्या हम पूजा-पाठ कर सकते हैं ? अगर हम ऐसा करते हैं तो उसका क्या फल मिलता है? 

हमारे महर्षियों के अनुसार जिस स्थान पर प्रभु को बैठाया जाता है, उसे दर्भासन कहते हैं, और जिस पर स्वयं साधक बैठता है, उसे आसन कहते हैं। 

योगियों की भाषा में यह शरीर भी आसन है और प्रभु के भजन में इसे समर्पित करना सबसे बड़ी पूजा है। 

जैसा देव वैसा भेष वाली बात भक्त को अपने इष्ट के समीप पहुंचा देती है ।

कभी जमीन पर बैठकर पूजा नहीं करनी चाहिए, ऐसा करने से पूजा का पुण्य भूमि को चला जाता है। 

नंगे पैर पूजा करना भी उचित नहीं है। हो सके तो पूजा का आसन व वस्त्र अलग रखने चाहिए जो शुद्ध रहे। 

लकड़ी की चैकी, घास फूस से बनी चटाई, पत्तों से बने आसन पर बैठकर भक्त को मानसिक अस्थिरता, बुद्धि विक्षेप, चित्त विभ्रम, उच्चाटन, रोग शोक आदि उत्पन्न करते हैं। 

अपना आसन, माला आदि किसी को नहीं देने चाहिए, इससे पुण्य क्षय हो जाता है। 


शास्त्रों के अनुसार मंत्र जाप करते समय हमेशा आसन बिछाना चाहिए। 

बिना आसन भूमि पर बैठकर मंत्र जाप करने से दुख की प्राप्ति होती है। 

बांस के आसन पर बैठकर मंत्र जाप या देव-पूजा नहीं करनी चाहिए। ऐसा करने से दरिद्रता आती है। 

पत्थर के आसन पर बैठकर पूजा या मंत्र जाप रोग होते हैं। साथ ही लकड़ी के आसन पर बैठकर पूजा करने से दुर्भाग्य की प्राप्ति होती है। 

घास के आसन पर बैठकर पूजा करने से यश और कीर्ति नष्ट हो जाती है। 

पत्ते के आसन पर बैठकर पूजा करने से मन बेचैन रहता है। 

यही कारण है कि पूजा के दौरान हमेशा अच्छे आसन का इस्तेमाल करना चाहिए।

वहीं शास्त्रों में भी यह बताया गया है कि पूजन के दौरान किस प्रकार के आसन का प्रयोग करना चाहिए। शास्त्रों में कहा गया है कि पूजन के लिए रेशम, कंबल, मृगचर्म, काष्ठ और तालपत्र के आसन का प्रयोग शुभ कार्यों के लिए करना चाहिए। वहीं शमी, श्रीपर्णी, कदंब, खेर और कश्मीरी शाला ये पांच प्रकार के आसन श्राद्ध और देव-अर्चन के लिए शुभ है। 

इसके अलावा कामना के अनुसार किस प्रकार का आसन होना चाहिए यह भी शास्त्रों में बताया गया है। जिसमें व्याघ्रचर्म का आसन सभी प्रकार की सिद्धियों के लिए शुभ है। ज्ञान और सिद्धि के लिए मृगचर्म का आसन शुभ मान गया है। 

वस्त्र का आसन रोगों से छुटकारा दिलाने वाला होता है।


निम्न आसनों का विशेष महत्व है

कंबल का आसन

कंबल के आसन पर बैठकर पूजा करना सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। लाल रंग का कंबल मां भगवती, लक्ष्मी, हनुमानजी आदि की पूजा के लिए तो सर्वोत्तम माना जाता है। 

आसन हमेशा चैकोर होना चाहिए, कंबल के आसन के अभाव में कपड़े का या रेशमी आसन चल सकता है। 


कुश का आसन

योगियों के लिए यह आसन सर्वश्रेष्ठ है। यह कुश नामक घास से बनाया जाता है, जो भगवान के शरीर से उत्पन्न हुई है। 

इस पर बैठकर पूजा करने से सर्व सिद्धि मिलती है। 

विशेषतः पिंड श्राद्ध इत्यादि के कार्यों में कुश का आसन सर्वश्रेष्ठ माना गया है, स्त्रियों को कुश का आसन प्रयोग में नहीं लाना चाहिए, इससे अनिष्ट हो सकता है।

किसी भी मंत्र को सिद्ध करने में कुश का आसन सबसे अधिक प्रभावी है। 


मृगचर्म आसन

यह ब्रह्मचर्य, ज्ञान, वैराग्य, सिद्धि, शांति एवं मोक्ष प्रदान करने वाला सर्वश्रेष्ठ आसन है। 

इस पर बैठकर पूजा करने से सारी इंद्रियां संयमित रहती हैं। कीड़े मकोड़ों, रक्त विकार, वायु-पित्त विकार आदि से साधक की रक्षा करता है। 

यह शारीरिक ऊर्जा भी प्रदान करता है। 


व्याघ्र चर्म आसन

इस आसन का प्रयोग बड़े-बड़े यति, योगी तथा साधु-महात्मा एवं स्वयं भगवान शंकर करते हैं। 

यह आसन सात्विक गुण, धन-वैभव, भू-संपदा, पद-प्रतिष्ठा आदि प्रदान करता है।

आसन पर बैठने से पूर्व आसन का पूजन करना चाहिए या एक एक चम्मच जल एवं एक फूल आसन के नीचे अवश्य चढ़ाना चाहिए। 

आसन देवता से यह प्रार्थना करनी चाहिए कि मैं जब तक आपके ऊपर बैठकर पूजा करूं तब तक आप मेरी रक्षा करें तथा मुझे सिद्धि प्रदान करें।


 ( *पूजा में आसन विनियोग का विशेष महत्व है*)। पूजा के बाद अपने आसन को मोड़कर रख देना चाहिए, किसी को प्रयोग के लिए नहीं देना चाहिए।


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