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कागनीति विज्ञान - आशुतोष राना

Friday, October 23, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

आशुतोष राना ( प्रसिद्ध अभिनेता व लेखक)


नगर की राजनीति में अचानक भूचाल आ गया, कल रात तक नगरपालिका पर पंचकौंड़ी लाल की पार्टी का पंचरंगा झंडा फहरा रहा था और सुबह होते-होते वहाँ पर कौंड़ीदयाल की पार्टी का नौरंगा झंडा फहराने लगा। 

कौंड़ी दयाल ने पंचकौंड़ी लाल की पार्टी के पाँच पार्षद पटा लिए थे, पट्टूओं ने पटते ही पटाक से अपना पत्र नगर पालिका अधिकारी को सौंपते हुए कहा- अब से ना तो पंचकौंडी हमारे प्रमुख हैं और ना ही उनकी पार्टी हमारा परिवार। हम कौंड़ी दयाल के पक्ष में हैं उन्हें नगर पालिका अध्यक्ष बनाया जाए। 

पंचकौंड़ी के पंक्चर होते ही कौंड़ी ने अल्पमत में होते हुए भी बहुमत के सिद्धांत को आधार बनाकर नगर पालिका को टेकओवर करने का दावा पेश कर दिया। परिणामस्वरूप पंचकौंड़ी के हाथ से सत्ता फिसलकर कौंड़ी के हाथ में आ गयी, पार्षदों की सदस्यता रद्द होने के कारण नगर में पाँच सीटों पर फिर से चुनाव होना तय हुआ। 

नगर में चुनावी सरगर्मियाँ बढ़ गयीं थीं, दोनों तरफ़ से ताल ठोकी जा रहीं थीं, गाल बजाए जा रहे थे, माल और लाल पर सवाल उठाए जा रहे थे। जनता भौंचक्की थी क्योंकि उसने इस बार पंचकौंड़ी लाल को मौक़ा दिया था लेकिन कौंड़ी दयाल ने अपनी चाल से पंचकौंड़ी लाल को हलाल कर दिया था। बेहाल जनता की हालत बिल्कुल वैसी थी जैसे किसी बटमार ने पॉकेट के साथ-साथ उसका पुट्ठा भी काट लिया हो ! 

नगर के प्रमुख पत्रकार कल्लू क्रोधी, सल्लू संदेही, चमन चवन्नी, हन्नू हुज्जती, अगड़ू आक्रोशी अपनी टीम के साथ मिलकर राजनैतिक लूट को लोकतंत्र सिद्ध करने के लिए नए-नए सूत्र, नए-नए गणित, नए-नए मुद्दे उछाल रहे थे जिससे जनता का लोकतंत्र पर जमा हुआ विश्वास ना टूटे, वो अपने आपको ठगा हुआ महसूस ना करे, जनता को तसल्ली मिले कि उसके वोट की भेंकर क़ीमत है और वो बिलकुल चिंता ना करे क्योंकि वो ही असली राजा है जो नेताओं को कभी राजा तो कभी रंक बना देती है। 

छोटे शहरों में चाय की दुकानें राजनीति, प्रचार-प्रसार, चरित्र छिद्रान्वेषण, मूल्यांकन, आँकलन का अड्डा होती हैं। इसलिए ये पत्रकार इन्हीं गुमठियों के इर्द गिर्द चक्कर लगाते रहते। 

नगर में हल्के टी स्टॉल की विकट ख्याति थी क्योंकि यहाँ पर मुरलीमनोहर शाम बिहारी उर्फ़ बड्डे की बैठक जमती थी, बड्डे ने मंडे से लेकर संडे तक और डंडे से लेकर झंडे तक सभी कलाओं को सिद्ध किया हुआ था, लोग राजनीति शास्त्र में एम.ए. करते हैं लेकिन बड्डे ने ‘कागनीति’ में डॉक्टरेट की थी, लोग अर्थशास्त्री होते हैं लेकिन बड्डे ने अर्थशास्त्र के साथ-साथ व्यर्थशास्त्र भी सिद्ध किया हुआ था, बड्डे मात्र दर्शन शास्त्र में ही नहीं, प्रदर्शन शास्त्र में भी निपुण थे, बड्डे को समाज शास्त्र की केमिस्ट्री में छिपे हुए गणित और गणित की जमावट से उत्पन्न होने वाले रसायन की अखंड जानकारी थी। 

चमन चवन्नी ने मौक़ा देखकर बड्डे पर सवाल छोड़ दिया- बड्डे, होने वाले उपचुनाव के बारे में आपका क्या सोचना है ? पंचकौंड़ी और कौंड़ी में से कौन बाज़ी मारेगा ? 

बड्डे ने एक उड़ती सी नज़र चवन्नी पर डाली और बोले- जे चुनाव कौंड़ी विरुद्ध पंचकौंड़ी नहीं बल्कि पंचकौंड़ी विरुद्ध पंचकौंड़ी है। 

कल्लू क्रोधी ने हस्तक्षेप करते हुए कहा- ये आप कैसे कह सकते है ? 

बड्डे ने क्रोधी को लताड़ते हुए कहा- कैसे क्या कह सकते हैं ? तुमें दिखा नई रओ का ? साल भर पैले जो पाँच आदमी पंचरंगा झंडा में लिपट के चुनाव लड़े थे बेई पाँच अब पंचरंगा के विरुद्ध नौरंगा से चुनाव लड़ेंगे। ऐफ़िडेविट में अपनी बलदियत बदल देने से कछु डीएनए थोड़ी बदल जाएगा ? 

आक्रोशी ने बात काटते हुए कहा- अच्छा.. आप तो जे बताओ कि इस चुनाव में कौन सा इशू प्रमुख होगा ? 

बड्डे छूटते ही बोले- तुम प्रखर आदमी होके ‘खर’ ( गधा ) जैसी बातें कर रहे हो आर ! चुनाव ‘इशू’ से नही अश्रुओं से, ‘इमोशन’ से जीता जाता है.. तो जे फ़ालतू में इशू मिशू के चक्कर में ना पड़ो, इमोशन पर ध्यान दें। एक तरफ़ ‘चलो-चलो’ की रट लगाने वाले पंचकौंड़ी लाल हैं उनके पास किसी की बात सुनने का बिलकुल टेम नई है, तो दूसरी तरफ़ ‘और बताओ-और बताओ’ वाले कौंड़ीदयाल हैं जो जानता है कि कलजुग में आदमी इतना कल्पा हुआ है कि बो अपनी बात बताबे के लाने अपने प्रान तक छोडबे तैयार है, सो कुछ देर पब्लिक का प्रलाप, उसका विलाप सुने में कोई हरजा नई हैं क्योंकि जनता खों अपनी समस्या के निदान से ज़्यादा रुचि अपने हृदय के उफ़ान को व्यक्त करने में है। कौंड़ी होंय चाये पंचकौंड़ी, दोई बहुत अच्छे से जानते हैं कि पब्लिक खों समस्या के उपचार में नई, समस्या के प्रचार में रुचि है सो दोई जने “प्रचार ही उपचार है” का फ़ॉर्म्युला इस्तेमाल करते हैं। जे जुग राजनीति का नई कागनीति का है। 

हुज्जती ने बड्डे कि इस बात का पुरज़ोर विरोध करते हुए कहा- बड्डे आप राजनीति को कागनीति कहकर उसखों बदनाम कर रहे हैं। 

बड्डे ने बहुत शांति से कहा- उठाई जीभ और तलुआ से मार दयी” की आप राजनीति को बदनाम कर रहे हैं ! अरे, किसी भी व्यवस्था को नाम या बदनाम हैसियत वाला आदमी करता है। एक बुट्टूल्ली ( वोट ) रखके हमाइ इत्ति हैसियत नई है की हम उसखों बदनाम कर सकें, समझे। 

जनता की हैसियत मूर्तिकार जैसी होती है, बो मिट्टी के लौंदों को मूर्ति बनाती है, लौंदों के मूर्ति बनते ही उनकी क़ीमत बढ़ जाती है बे पूजने लगती हैं और बिक जाती हैं, क़ीमत मूर्ति की होती है मूर्तिकार की नई.. का समझे ? 

किसी भी विज्ञान को अच्छे से समझने के लिए उसकी थ्योरी को प्रैक्टिकल की कसौटी पर कस कर ही समझा जाता है, लेकिन कागनीति विज्ञान की थ्योरी और प्रैक्टिकल में समानता नही होती। कागनीति विज्ञान की थ्योरी कहती है कि लोकतंत्र में जन प्रतिनिधियों को ‘चुनकर’ ही सरकार बनाई जाती है, किंतु इसके प्रैक्टिकल में सिखाया जाता है आप जन प्रतिनिधियों को ‘चुगकर’ भी सरकार बना सकते हैं। यदि आप चुनने में होशियार हैं तो सिर्फ़ जनता माने जाएँगे किंतु यदि आप चुगने में माहिर हैं तो एक चतुर नेता की ख्याति को उपलब्ध होंगे। तो जादा इशू फिसू ना करो.. कागनीति के अनुसार जो चुनने की अपेक्षा ‘चुगने’ में मास्टर होगा उसकी धकेगी बस। 

तुमाई जे विदुर नीति, भृगु नीति, चाणक्य नीति, इत्यादि जितनी भी नीतियाँ हैं जे सब भूतकाल में उपयोगी थीं और भूत से चिपका नई जाता उसखों भगाया जाता है क्योंकि भूत से चिपका हुआ आदमी हो या संस्था उसखों संसार भूत मानकर ऑटमैटिक उससे अपनी दूरी बना लेता है। लेकिन कागनीति का सम्बन्ध वर्तमान और भविष्य से है इसलिए जो प्रतिष्ठा कागनीति की है बो किसी भी नीति की नई है। कलजुग में कागनीति ही सफल होगी जे बात हम नई रामचंदर जी बोल गए हैं, और बो भी हमसे तुमसे नहीं डायरक्ट सीता मैया से- रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलियुग आएगा। 

हंस चुगेगा दाना जूठा, कौवा मोती खाएगा।”

अथश्रीकागनीति प्रथम अध्याय समाप्त

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