Responsive Ad Slot

देश

national

द मालगुडी डेज - निखिलेश मिश्रा

Thursday, October 29, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

निखिलेश मिश्रा, लखनऊ

80 के दशक में भारतीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने अनेक आजाद निर्माताओं और निर्देशकों को टेलीविज़न धारावाहिक बनाने के आमंत्रण दिये। आर के नारायण इनका पूरा नाम पूरा नाम रासीपुरम कृष्णस्वामी एय्यर नारायणस्वामी की कृति पर आधारित मालगुडी डेज़ इन्हीं में से एक ऐसा धारावाहिक था जो खासा लोकप्रिय हुआ और जिसका इस दौर के बच्चों पर गहरा असर पड़ा। धारावाहिक में स्वामी एंड फ्रेंड्स तथा वेंडर ऑफ स्वीट्स जैसी लघु कथाएँ व उपन्यास शामिल थे। इस धारावाहिक को हिन्दी व अंग्रेज़ी में बनाया गया था। इसके इंट्रो में हम जो स्केच देखते थे, वो नारायण के छोटे भाई आर. के. लक्ष्मण बनाते थे। लक्ष्मण बहुत फ़ेमस कार्टूनिस्ट थे।

नारायण का जन्म चेन्नई में 10 अक्टूबर, 1906 को हुआ था. इनके पापा हेडमास्टर थे। नारायण को मिलाकर हेडमास्टर जी के आठ बच्चे थे। ये तीसरे नंबर के थे। साउथ इंडिया में बच्चों को जो नाम दिए जाते हैं वो सर नेम के बाद लगता है। इसी वजह से लक्ष्मण और नारायण के शुरुआती नाम एक थे- रासीपुरम कृष्णस्वामी एय्यर।

नारायण ने अपना साहित्यिक करियर शोर्ट स्टोरीज़ से शुरू किया, जो ‘द हिंदू’ में छपा करती थीं। इनकी पहली नॉवेल का नाम था ‘स्वामी एंड फ्रेंड्स’। जैसे आज भी नए लेखकों को अपनी किताब के लिए पब्लिशर्स ढूंढने में दिक्कत आती है, ठीक यही दिक्कत उस समय भी नारायण को हुई। उन्हें शुरुआत में कोई पब्लिशर नहीं मिला। फिर ये ड्राफ़्ट पहुंचा ग्राहम ग्रीन तक, कॉमन फ्रेंड पूमा की मदद से। ग्रीन एक इंग्लिश नॉवेलिस्ट थे। इन्हें 20वीं सदी के सबसे महान लेखकों में गिना जाता है। ग्रीन को ये नॉवेल बहुत पसंद आई। उन्होंने इसे पब्लिश करवाया। इसके बाद इन दोनों में अच्छी दोस्ती हो गई।

छोटी कहानियों के संग्रह के रूप में मालगुडी डेज़ सबसे पहले 1943 में पब्लिश हुई थी। नारायण को अपने काम के लिए कई अवॉर्ड्स और सम्मान दिए गए। 1958 में अपने नॉवेल ‘द गाइड’ के लिए इन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया था। 1964 में पद्म भूषण। 1980 में एसी बेनसन मेडल। 1989 में इन्हें राज्य सभा के लिए नॉमिनेट किया गया था। राज्य सभा के उन छह साल में नारायण ने एजुकेशन सिस्टम को बेहतर करने की कोशिश की। 2000 में इन्हें पद्म विभूषण से भी नवाज़ा गया।

‘द ग्रेंडमदर्स टेल’ नारायण की आखिरी नॉवेल थी. ये 1992 में पब्लिश हुई थी। इसकी कहानी उन्हें उनकी नानी ने सुनाई थी, जो नानी की मां के बारे में थी। कैसे एक औरत की नई-नई शादी होती है और उसका पति कहीं गायब हो जाता है। वो कई साल उसे ढूंढती रहती है। आखिरकार सारी तकलीफ़ों के बीच उसे एक दिन उसे उसका पति मिल जाता है।

पद्मराग फिल्म्स के टी.एस.नरसिम्हन द्वारा 1987 में निर्मित मालगुडी डेज़ का निर्देशन दिवंगत कन्नड़ अभिनेता व निर्देशक शंकर नाग ने किया था। इस धारावाहिक का फिल्मांकन कर्नाटक के शिमोगा जिले स्थित अगुम्बे में किया गया। धारावाहिक के संगीत निर्देशक थे जाने माने वायलिन वादक एल.वैद्यनाथन।

"वेंडर ऑफ स्वीट्स" एक मिठाई विक्रेता जगन की कहानी थी जिसमें विदेश से लौटे अपने बेटे के साथ उसके पटरी बिठाने के प्रयास का वर्णन था। जगन की भूमिका में थे, शंकर के भाई और कन्नड़ और हिन्दी फिल्मों के जाने माने अभिनेता अनंत नाग।

"स्वामी एंड फ्रेंड्स" दस बरस के स्वामीनाथन, जिसे उसके दोस्त स्वामी पुकारते हैं, के इर्दगिर्द घूमती है। स्वामी के किरदार को स्कूल जाना ज़रा भी पसंद न था, पसंद था तो अपने दोस्तों के साथ मालगुडी में मारे मारे फिरना। स्वामी के पिता, जिनका किरदार गिरीश कर्नाड ने निभाया था, सरकारी नौकर थे। स्वामी के दो करीबी दोस्त थे, मणि और चीफ पुलिस सुपरीटेंडेंट के पुत्र राजम। स्वामी के किरदार में मंजुनाथ तो जैसे घर घर में लोकप्रिय हो गये थे। इसी लोकप्रियता के बल पर वे अग्निपथ जैसी मुख्यधारा की फिल्म में अमिताभ बच्चन  जैसे अभिनेता की बचपन की भूमिका पा सके। पर बड़े होने पर वे अभिनय की दुनिया से दूर ही रहे।

धारावाहिक में दिखाये चित्रों को लेखक के भाई और टाईम्स ऑफ इंडिया के जानेमाने कार्टूनिस्ट आर के लक्ष्मण ने तैयार किया था। दूरदर्शन पर मालगुडी डेज़ के कुल 39 एपिसोड प्रसारित हुये। यह धारावाहिक मालगुडी डेज़ रिटर्न नाम से पुनर्प्रसारित भी हुआ।

लेखक ने इस संग्रह की कहानियों की रचना एक काल्पनिक शहर मालगुडी को आधार बनाकर की हैं। मालगुडी को प्रायः दक्षिण भारत का एक काल्पनिक कस्बा माना जाता है; परंतु स्वयं लेखक के कथनानुसार- "अगर मैं कहूँ कि मालगुडी दक्षिण भारत में एक कस्बा है तो यह भी अधूरी सच्चाई होगी, क्योंकि मालगुडी के लक्षण दुनिया में हर जगह मिल जाएँगे।"

94 साल की उम्र में आर. के. नारायण का 13 मई, 2001 को देहांत हो गया था। नारायण बहुत पॉपुलर थे लेकिन एक हाई प्रोफ़ाइल राइटर्स का तबका था, जिन्हें उनके लिखने की स्टाइल से दिक्कत थी। क्रिटिक्स का पॉइन्ट रहता था कि नारायण की इंग्लिश बहुत आसान है। हमेशा गांव के बारे में लिखते हैं। उन्हें शब्दों का उतना ज्ञान नहीं है। हमारी समझ से तो उनकी लिखाई की सबसे खूबसूरत बात ही यही थी जो क्रिटिक्स को अटपटी लगती थी।


ता...ना...ना........

ताना....ना...ना..

ना......

No comments

Post a Comment

Don't Miss
© all rights reserved
Managed By-Indevin Infotech-Leading IT Company