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अब पाप जगत में भारी है - कल्पना राजीव त्रिपाठी

Tuesday, October 6, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi
कल्पना राजीव त्रिपाठी( इंदौर (म.प्र.))
      


गली-घाट पर सिया पड़ी है 

अब कोई जनक न आएंगे l

हर नुक्कड़ पर लुटे द्रोपदी 

अब गोविन्द किसे बचाएंगे ll


कलयुग का आरम्भ हो चुका 

अब पाप जगत में भारी है l

दरिंदो  के पौरुष के आगे 

बेवस समाज की नारी है ll


कितनी बेटियां लुटी देश में 

कितने बेटों  को जेल हुई l

कितने दरिंदे गली में घूमें 

कितनी ही घर का खेल हुईं  ll


कई प्रेम की भेंट चढ़ चुकी 

कितनी दहेज का खेल हुई l

क्या तुमने देखा है जाकर...? 

कितनों की अब तक बेल हुई ll


कितनों की तो रपट नहीं है 

जो घर में ही लुट जाती हैं l

कितनी सांसे जन्म से पहले 

कुछ घरों में ही घुट जाती हैं ll


हुआ नपुंसक देश का शासन 

अपराधी भी  बचाए जाते हैं l

ऐसे दुष्कर्मी इंसानो से तो  

राक्षस भी स्वयं लजाते हैं ll


है समाज का सत्य घिनौना 

जो तुन्हे  नजर न आता है l

जिनकी मिडिया फोटो खींचे

बस तुम्हे वही दिख पाता है ll


मत पूँछो ऐसे प्रश्न भी तुम 

क्योंकि तुम भी अपराधी हो l

हुआ आज जो मेरे संग में 

तुम भी उसमें सहभागी हो ll


 क्रोध तुम्हारा एकतरफा है 

और रुदन में भी परपंच छिपा l

दलित-कुलीन की बेटी कहकर 

मेरी मौत पे भी षड़यंत्र रचा ll


कैसे दुर्जन लोग हो तुमसब 

बस मुझ पे  ही अश्रु बहाते हो.. !

जब लुटती हैं सामने बेटियां 

तो किस बिल में छिप जाते हो..? 


है अधिकार नहीं तुम सब को 

मेरा शोक मनाने आओ तुम l

गली-मोहल्लों की बिटियों के 

बस भाई-पिता बन जाओ तुम ll


फिर न लुटेगी कोई  द्रोपदी 

न ही दुश्शाशान बच पाएगा l

जब इंसान को खुद के अंदर 

स्वयं ही कृष्ण मिल जाएगा ll

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