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चंदनिया मोरे मन को भाय - डॉ कमलेश नारायण श्रीवास्तव

Tuesday, October 20, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

डा . कमलेश नारायण श्रीवास्तव "सरस"

( चिकित्सक एवं साहित्यकार, लखनऊ) 

चंदनिया मोरे मन को भाय 

मनोरम अपनी छटा बिछाय

मनोरम अपना रूप दिखाय 

चंदनिया मोंकों मोहे हाय 

चंदनिया _ _ _ _ _ _ _ _ _ 

रूप तेरा है परम अनोखा 

जो जो देखे वोह हर्शाय 

पवन झकोरे छूना चाहें 

घूंघट मे तू छिप जाय 

चंदनिया काहे को शरमाय

चंदनिया _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ 

चमचमचमके रूप तुम्हार 

ज्यों ज्यों रात है घराय 

भरी नज़र जब तोको देखे 

तू मन्द मन्द है मुसकाया 

चंदनिया मोरे मन को लुभाय 

चंदनिया मोरे _ _ _ _ _ _ _ _ 

सारी रात चकोर निहारे 

तेरा मन मोहक यह रूप 

पर होत भोर होये मायूस 

चंदनिया काहे को तड़पाय 

चंदनिया मोरे _ _ _ _ _ _ _ _ _ 

मनोरम अपनी छटा _ _ _ _ _ _ _ 

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