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कैसे बनती है हवा से पानी और ऑक्सीजन ? -निखिलेश मिश्रा

Sunday, October 11, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

निखिलेश मिश्रा ( लखनऊ)

एटमोस्फेरिक वॉटर जनरेटर-  हवा में मौजूद नमी से पानी बनाने की तकनीक

सम्भवतः फरवरी- मार्च 2019 में नवरत्न कंपनी, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (Bharat Electronics Ltd-BEL) ने एक नए उत्पाद, एटमोस्फेरिक वॉटर जनरेटर (Atmospheric Water Generator-AWG) का एयरो इंडिया 2019 कार्यक्रम में अनावरण किया था।

माना गया था कि एटमोस्फेरिक वॉटर जनरेटर दुनिया में पेयजल की बढ़ती हुई ज़रूरत को पूरा करने हेतु एक नया समाधान उपलब्ध कराएगा। दरअसल वायुमंडल में मौज़ूद नमी से जल निकालने के लिये एटमोस्फेरिक वॉटर जनरेटर का उपयोग किया जा सकता है।

AWG की कार्य प्रणाली

वॉटर जनरेटर वायुमंडल में मौज़ूद नमी से जल निकालने और इसे शुद्ध करने के लिये नवीन प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करता है।

यह वायुंडल की नमी को संघनित करते हुए शुद्ध, सुरक्षित और स्वच्छ पीने योग्य पानी बनाने के लिये उष्मा विनिमय का प्रयोग करता है।

इसमें एक मिनरलाइज़ेशन यूनिट भी लगी है जो पानी को पीने योग्य बनाने के लिये उसमें खनिज मिलाती है।

एटमोस्फेरिक वॉटर जनरेटर को गतिशील वाहनों में भी लगाया जा सकता है।

एटमोस्फेरिक वॉटर जनरेटर (AWG) 30 लीटर/दिन, 100 लीटर/दिन, 500 लीटर/दिन और 1,000 लीटर/दिन तक जल उपलब्ध करा सकता है।

AWG का निर्माण

एटमोस्फेरिक वॉटर जनरेटर (AWG) का निर्माण भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड द्वारा CSIR-IICT और MAITHRI (हैदराबाद स्थित एक स्टार्ट-अप कंपनी) के सहयोग से किया जा रहा है।

भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड स्टार्ट-अप इंडिया पहल के एक हिस्से के रूप में स्टार्ट-अप कंपनियों को सहायता प्रदान कर रही है।

जहाँ तक विंड टरबाइन से पानी  बनाने की बात है तो यह काम लगभग आठ साल पहले एक फ्रेंच कंपनी कर चुकी है। इसका नाम है Eole Water। कंपनी के फाउंडर मार्क पैरंट ने कैरिबियाई देशों में रहने के दौरान इस बारे में सोचना शुरू किया था। फिर 2012 में उन्होंने आबू धाबी के रेगिस्तान में पहली विंड टरबाइन लगाई।

रेगिस्तान की हवा सामने से टरबाइन में जाती। जेनरेटर से इसे गरम किया जाता और फिर कूलिंग कम्प्रेशर से ठंडा। नमी को एक जगह जुटा लिया जाता और आख़िर में एक टैंक में जमा हो जाता साफ़ पानी। कंपनी का कहना था कि इस तकनीक में हवा की स्पीड कम से कम 15 मील प्रतिघंटे यानी 24 किमी से कुछ अधिक होनी चाहिए। इससे एक दिन में 500 से 800 लीटर तक शुद्ध पानी बनाया जा सकता है। इस मात्रा को एक हज़ार लीटर तक भी बढ़ा सकते हैं और इतना पानी एक छोटे-से गांव के पीने के लिए पर्याप्त होगा। 

विंड टरबाइन से पानी बनाने का यह पहला प्रयोग था, जो पूरी तरह सफल रहा। कंपनी की योजना थी अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के उन दूरदराज के इलाक़ों में इससे फायदा पहुंचाने की, जहां बेसिक सुविधाएं भी नहीं हैं। हालांकि तब यह प्रोजेक्ट बहुत आगे नहीं बढ़ पाया और इसका कारण बताया गया पैसा। एक विंड टरबाइन लगाने की लागत करीब पांच करोड़ रुपये आंकी गई। जाहिर है कि पानी के लिए जूझ रहे गरीब मुल्क इतना खर्च नहीं उठा सकते थे। 

विंड टरबाइन को एक बार के लिए भूल जाएं तो हवा से पानी बनाने की तकनीक सदियों पुरानी है। इंका सभ्यता के लोग पांच सौ साल पहले ही ओस को इकट्ठा कर उसे पेयजल में बदलना सीख गए थे। इस कला ने ही दक्षिण अमेरिका की महान सभ्यता को फलने-फूलने में मदद की। एक पुराना तरीका और है, फॉग फेंस। इसमें लंबाई में एक जाल लगाकर कोहरे से पानी अलग किया जाता है।

आज के समय की बात करें तो ऐट्मस्फेरिक वॉटर जेनरेटर का इस्तेमाल कर हवा से पानी बनाने का काम बहुत पहले से चल रहा है। खाड़ी देशों में ख़ासकर ऐसी कई कंपनियां हैं, लेकिन इस तकनीक की सबसे बड़ी खामी है बिजली की खपत और ग्लोबल वॉर्मिंग में इजाफा। इसीलिए कंपनियां दूसरे विकल्पों की तलाश में हैं। सोलर एनर्जी भी इसके इस्तेमाल का एक विकल्प है।

क्या हवा से ऑक्सीजन अलग की जा सकती है? यह काम पानी बनाने से भी ज़्यादा कठिन, लेकिन संभव है। अमेरिका और यूरोप के देशों में विंड एनर्जी का इस्तेमाल कर पानी के विद्युत अपघटन यानी इलेक्ट्रोलिसिस की कोशिश है। इसका सीधा-सा मतलब हुआ कि पानी को उसके दो मूल तत्वों, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में बांट देना। इससे दोनों गैसें मिल जाएंगी। वैज्ञानिकों का मकसद बड़े पैमाने पर हाइड्रोजन बनाना है, जिसका इस्तेमाल साफ-सुथरी ऊर्जा के रूप में किया जा सके।

कई उपकरण हवा से ऑक्सीजन निकाल सकते है। उदाहरण के तौर पर हाल ही में हर जिले में स्वास्थ्य विभाग ने ‘ऑक्सीजन कंसनट्रेटर’ मशीन भेजी है, जो सीधे हवा से प्रतिमिनट पांच लीटर मेडिकल ऑक्सीजन बनाएगी। एक मशीन दो मरीजों के काम आ सकती है।

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