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मॉब लिंचिंग : डिवाइड एंड रूल का नया हथियार

Monday, October 19, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

 

निखिलेश मिश्रा, लखनऊ                     

भीड़ द्वारा हत्या (Mob Lynching) की निरन्तर बढ़ती घटनाएँ देश की सामाजिक व सांस्कृतिक व्यवस्था को गंभीर क्षति पहुँचा रही हैं। ‘विश्व-बंधुत्व’ और ‘अहिंसा परमोधर्मः’ की शिक्षा देने वाले भारत में हाल ही में हुई कुछ घटनाएँ परेशान करती हैं। पिछले कुछ समय से भीड़ द्वारा लोगों को पकड़कर मार डालने की घटनाएँ हुई हैं। इन घटनाओं में कोई  गौमांस खाने का तथाकथित आरोपी था, कोई दुष्कर्म का आरोपी था, कोई गायों को वधशाला के लिये ले जाने का तथाकथित दोषी तो कोई चोरी करने का दोषी था। कश्मीर में तो एक पुलिस अधिकारी को बिना वजह ही भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। ऐसी घटनाएँ उत्तर प्रदेश, झारखंड, महाराष्ट्र, गुजरात, जम्मू और कश्मीर आदि राज्यों में हुई हैं।

भीड़ द्वारा हत्या अनुचित व आपराधिक कृत्य है, क्योंकि-

भीड़ कभी भी आरोपी को अपना पक्ष बताने का अवसर नहीं देती।

जब हम छोटे थे तो तेज आंधी या तूफान में अक्सर खुद को संभाल नहीं पाते थे। हमें लगता कि वो तेज आंधी अपने साथ छतों पर लहराते झंडों, खपरैल छतों, पेड़ की टहनियों के साथ हमें भी अपने साथ उड़ा कर ले जाएगी।

तब हमारे बड़े बुज़ुर्ग हमसे कहा करते कि- जब भी ऐसी तेज आंधी या तूफान आए तो समूह में रहना- दस-पंद्रह लोग एक-दूसरे का हाथ पकड़कर, किसी एक जगह पर जमीन पर बैठ जाना। आंधी गुजर जाएगी और समूह आपको सुरक्षा देगा।

ये एक ऐसा तंत्र है जिसकी न तो कोई विचारधारा है न ही कोई सरोकार। वो कहीं भी किसी भी बात पर आक्रामक हो जाती है और जिस किसी से भी उसको नफरत या घृणा होती है वो उसे उसी वक्त सजा देने का फैसला कर देती है। अक्सर ये सजा रंग-रूप और बर्ताव में बर्बर होती है।

लेकिन आज जिस तरह से समूह एक उन्मादी भीड़ में तब्दील होता जा रहा है उससे हमारे भीतर सुरक्षा कम, डर की भावना बैठती जा रही है। भीड़ अपने एक अलग किस्म के तंत्र का निर्माण कर रही है- जिसे आसान भाषा में हम भीड़तंत्र भी कह सकते हैं।

भीड़ में सभी लोग अतार्किक तरीके से हिंसा करते हैं।

ऐसे कृत्य से कानून, विधि की उचित प्रक्रिया व प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन होता है। 

संविधान में जीवन के अधिकार को ‘मूल अधिकारों’ को श्रेणी में रखा गया है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद-21 कहता है- ‘किसी व्यक्ति को, उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जायेगा, अन्यथा नहीं।’ भीड़ द्वारा हमला और हत्या को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जीवन के मौलिक अधिकार पर ‘वीभत्स’ हमले के रूप में देखा जा सकता है।

भारत एक बहुभाषी, बहुधर्मी और बहुसांस्कृतिक राष्ट्र है। यहाँ प्रत्येक नागरिक को विचार, विश्वास, धर्म, उपासना और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिली हुई है। साथ ही, यहाँ की संस्कृति भी मिल-जुलकर रहने तथा ‘वसुधैव-कुटुम्बकम्’ के मूल्य को महत्त्व देती है। एक सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली में ‘विधि का शासन’ निहित है। यहाँ प्रत्येक नागरिक से अपेक्षा की जाती है कि वह कानून का उल्लंघन न करे और किसी प्रकार की गैर-कानूनी गतिविधि न करें।

यदि किसी व्यक्ति से कोई अपराध हुआ है (चोरी, गौ-तस्करी) तो उसे सजा देने का हक कानून को है, न कि जनता उसकी सजा तय करेगी। गांधी जी ने भी कहा है कि ‘साध्य’ की पवित्रता के साथ-साथ ‘साधन’ की पवित्रता भी बहुत जरूरी है। अपराधी को स्वयं सजा देना कानूनी तौर पर तो गलत है ही नैतिक तौर पर भी अनुचित है। ऐसी घटनाएँ देश की एकता व अखण्डता को नुकसान पहुँचाती है तथा विखण्डनकारी शक्तियों को देश में अशांति फैलाने के लिये आधार उपलब्ध कराती हैं। अतः ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो, इसके लिये सरकार को कड़े कदम उठाने होंगे।

इस तरह की विकृति विज्ञान पर अमेरिका में भी लगातार पढ़ाई की जा रही है क्योंकि वहां भी ऐसी घटनाएं सामने आई हैं।


(प्रस्तुत लेख हेतु बाह्य श्रोतों का यथास्थान उपयोग किया गया है।)

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