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ढ़ाई आखर प्रेम का - शैलेंद्र श्रीवास्तव

Sunday, October 18, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

शैलेंद्र श्रीवास्तव ( प्रसिद्ध अभिनेता व लेखक)

ढ़ाई आखर मैं जब भी, 

प्रेम का पढ़ लेता हूँ।

प्रेम में डूबे हुए गीतों को, 

लिखता हूँ गा लेता हूँ।।

लोग गीतों में तुझे ढूँढतें हैं,

पूछते हैं कौन है वो?

मुस्कुराकरके छुपाता हूँ,

तेरा नाम हँस देता हूँ।।

ताड़नेवाले क़यामत की,

नज़र रखते हैं ।

ताड़नेवालों से बचता हूँ,

खिसक लेता हूँ।।

तू मेरी कल्पना है,

नाम तेरा लूँ कैसे ?

ख़ामोशी ओढ़ता हूँ,

तानों से बच लेता हूँ।।

मेरे ख़्वाबों की मल्लिका,

मेरा जुनून है तू।

तू ग़ज़ल गीत या कविता,

जो बन जाए बना देता हूँ।।

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