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मैं भी तेरा अंश हु - पूनम हिम्मत अद्वितीय

Tuesday, October 6, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

पूनम हिम्मत-अद्वितीय


मां तेरे दूध का कर्ज ,

मैं भी कर देती अदा,

छुपा रखती मुझको आंचल में, 

फिर देती कुछ भी सजा ।

भाई बहन सब रहते संग ,

उनको सब अधिकार दिया ,

मेरी क्या गलती की थी मां ,

मेरा क्यों बहिष्कार किया ?

रोता हूं जब छुपकर,

क्या तेरा ह्रदय नहीं दुखता ?

धिक्कार रहे मुझको रखवाले,

क्या तुझको नहीं दिखता?

क्यों अछूत हूं ,क्यों हूँ तिरस्कृत, 

मैंने क्या अपराध किया?

जननी है तू मेरी ,

फिर मुझको क्यों छोड़ दिया ।

एक ऐसा वर्ग जो समाज में उपस्थित है आज से नहीं बल्कि युगों से त्रेता युग हो या द्वापर युग इनका अस्तित्व रहा ।

रामायण ,महाभारत में वृह्लाला ,शिखंडी आदि को हम पढ़ चुके हैं। परंतु आज भी वह समाज में  उपेक्षित है।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है वह दूसरों के व्यवहार से प्रभावित होता है और दूसरों को अपने व्यवहार से प्रभावित करता है और इस तरह के परस्पर व्यवहार से सामाजिक संबंध स्थापित होते हैं परंतु भारतीय समाज में लिंग के आधार पर भेदभाव किया जाना एक परंपरा बन चुकी है ।

एक लड़की के होने पर उसके साथ दोहरा व्यवहार करना, यहां तक कि मां के गर्भ में यदि एक लड़की है तो उसको गर्भ में मार देने में  कोई तकलीफ नहीं होती और कानूनी सजा होने के बावजूद भ्रूण हत्या खुलेआम की जाती है, जिस समाज में लिंग के आधार पर ऐसे कृत्य किए जाते हो वहां लिंग विकलांगता को स्वीकार करना असंभव सा लगता है ।

भारतीय समाज पीढ़ी को बढ़ाने को महत्व देते हैं,ऐसे जनांग विक्षिप्त बच्चे बाधक स्वरूप उत्पन्न होते हैं, जिसे परिवार स्वीकार नहीं कर पाता परंतु यहां एक बात विचारणीय है कि क्या अपूर्ण विकसित जननांग ही संतान उत्पत्ति में बाधक है ?

यकीन नहीं पूर्ण रूप से जननांग विकसित स्त्री या पुरुष भी संतान उत्पन्न नहीं कर पाते तो क्या हम उन्हें समाज से बहिष्कृत कर देते हैं।

संविधान के भाग 3 में अनुच्छेद 12 से 35 तक सभी नागरिकों के मूल अधिकारों के बारे में बताया है ,14 से 18 तक समता का अधिकार दिया गया है अर्थात मूल वंश ,धर्म ,जाति ,लिंग या जन्म स्थान के आधार पर किसी भी प्रकार विभेद से रोका गया है ।

अनुच्छेद 23 से 24 के अंतर्गत शोषण के विरुद्ध मूल अधिकार दिए गए हैं जिनके बावजूद समाज में लैंगिक भेदभाव ,शोषण और बहिष्कार किया जाता है। 

विपरीत लिंग की तरह हावभाव करने पर माता-पिता का और अन्य सदस्यों द्वारा बार- बार टोका जाना जिससे मानसिक रूप से वह बच्चा प्रताड़ित होता है, परिवार में भाई बहनों द्वारा भी उसकी उपेक्षा की जाती है स्वयं माता-पिता भी परिवार की मान सम्मान के लिए उन्हें घर छोड़ने पर विवश कर देते हैं,जिससे उनकी शिक्षा बाधित होती है और शिक्षा के से दूर हो जाते हैं ।

अशिक्षित होने के कारण समाज से दूरी बनाने के कारण बेरोजगार रहते हैं जिससे अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए भीख मांगना या वेश्यावृत्ति आदि में लिप्त हो जाते हैं ।

परिवार में किसी व्यक्ति के व्यवहार आचरण रुचियां आदि का महत्व होता है परंतु यदि किसी किशोर या किसी और को उसके आचरण हाव भाव के लिए टीका टिप्पणी करना और शारीरिक बदलाव के कारण हीन भावना रखते हुए उन्हें बाहर आने-जाने पर पाबंदी लगाना ,किशोर के मन में विद्रोह की भावना के साथ  आत्मपरीक्षण की जटिलता बढ़ जाती है ,बालक नीरसता के भाव से ग्रसित होते जाते हैं और स्वयं को अपने परिवार से दूर होते पाते हैं ,उचित देखभाल एवं प्यार दुलार की कमी के कारण उनका सर्वांगीण विकास रुक जाता है ,उनका मानसिक उत्पीड़न इतना बढ़ जाता है कि वह स्वयं ही घर त्याग देते हैं और ऐसे लोगों से जुड़ जाते हैं जो स्वयं को समाज से अलग मानते हैं या समाज उन्हें अलग मानता है ।

ऐसे समूह से जुड़ने के पश्चात उनकी शिक्षा पूर्णतया बंद हो जाती है और रोजगार के अवसर समाप्त हो जाते हैं एक ऐसी दुनिया का हिस्सा बन जाते हैं जिनके अलग परंपराएं, विधियां मूल्य एवं जीवन शैली होते हैं धीरे-धीरे समाज से अलग होते जाते हैं एक तरफ जहां ऐसे बच्चों को ध्यान देने की जरूरत होती है वहां उनका तिरस्कार किया जाना उन्हें अंदर तक तोड़ देता है ।

माता-पिता के साथ समाज भी उन्हें हेय दृष्टि से देखने लगता है,  उनकी अंतरात्मा असहय पीड़ा वेदना के महासागर में डूब जाती है ।

जब वह स्वयं को समझने की कोशिश में है वही उसे  घर से निष्कासित कर दिया जाता है और वह दर-दर भटकता है बिना किसी अपराध के।

आखिर उसकी क्या गलती है , इसमें दोषी वह है या माता-पिता?

उनकी इस दयनीय स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है शिक्षा से वंचित है ,स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित हैं ,समाज में उन्हें हेयदृष्टि से देखा जाता है आख़िर  उनके साथ ऐसा दुर्व्यवहार किया जाना कहां तक उचित है।

उन्हें भी परिवार और समाज से  प्रेम और सहयोग की ही आवश्यकता है।

मानव अधिकार आयोग द्वारा भारत में ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण किया  जिसमे बताया गया कि ट्रांसजेंडर समुदाय के 92 प्रसिद्ध फ़ीसदी लोगों का आर्थिक बहिष्कार किया गया उन्हें आजीविका और जीवन यापन के मौलिक अधिकारों से वंचित रखा गया ।

ट्रांसजेंडर अधिकार संरक्षण बिल 2019 लाया गया जिसका उद्देश्य  समाज के हाशिए पर खड़े ट्रांसजेंडर वर्ग के प्रति दुर्व्यवहार, भेदभाव को समाप्त कर समाज की मुख्यधारा से जोड़ना है।

यह तो कानूनी प्रक्रिया है और इसे तब तक साकार रूप में नहीं लिया जा सकता जब तक हम अपने  अंदर से उनके प्रति दुर्भावना को खत्म नहीं करेंगे, अब हमारी जिम्मेदारी है कि हम ऐसे किशोर किशोरियों के प्रति भेदभाव छोड़ कर उन्हें अपनाएं,परिवार और समाज की तरफ से  प्रेम ,सम्मान के साथ अन्य अवसर उपलब्ध कराएं जो सामान्य  बच्चों को प्राप्त होते हैं , क्योंकि वह कसी अलग दुनिया के आए हुए नहीं है वह हमारे और आपके ही बच्चे हैं जिनके साथ इतने लंबे अरसे से इतनी  क्रूरता की गई।

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