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ये है दिशाओं के देवता - आचार्य डॉ प्रदीप द्विवेदी

Wednesday, November 4, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

आचार्य डॉ प्रदीप द्विवेदी

वरिष्ठ सम्पादक- इंडेविन टाइम्स समाचार पत्र

किसी भी महत्वपूर्ण पर्व पर सभी दिशाओं के देवताओं का आह्‍वान करके उनकी विधिवत पूजा करके के बाद ही त्योहार निमित्त पूजा कर आरंभ किया जाता है। आओ जानते हैं कि किसी दिशा में कौन से देवता स्थित हैं या किस दिशा में मुख करके कौन से देवताओं की पूजा की जाती है।

वराह पुराण के अनुसार दिग्पालों की उत्पत्ति की कथा इस प्रकार है- जब ब्रह्मा सृष्टि करने के विचार में चिंतनरत थे, उस समय उनके कान से 10 कन्याएं उत्पन्न हुईं जिनमें मुख्य 6 और 4 गौण थीं।

1. पूर्वा: जो पूर्व दिशा कहलाई।

2. आग्नेयी: जो आग्नेय दिशा कहलाई।

3. दक्षिणा: जो दक्षिण दिशा कहलाई।

4. नैऋती: जो नैऋत्य दिशा कहलाई।

5. पश्चिमा: जो पश्चिम दिशा कहलाई।

6. वायवी: जो वायव्य दिशा कहलाई।

7. उत्तर: जो उत्तर दिशा कहलाई।

8. ऐशानी: जो ईशान दिशा कहलाई।

9. उर्ध्व: जो उर्ध्व दिशा कहलाई।

10. अधस्‌: जो अधस्‌ दिशा कहलाई।

उन कन्याओं ने ब्रह्मा को नमन कर उनसे रहने का स्थान और उपयुक्त पतियों की याचना की। ब्रह्मा ने कहा- 'तुम लोगों की जिस ओर जाने की इच्छा हो, जा सकती हो। शीघ्र ही तुम लोगों को तदनुरूप पति भी दूंगा।'

इसके अनुसार उन कन्याओं ने 1-1 दिशा की ओर प्रस्थान किया। इसके पश्चात ब्रह्मा ने 8 दिग्पालों की सृष्टि की और अपनी कन्याओं को बुलाकर प्रत्येक लोकपाल को 1-1 कन्या प्रदान कर दी। इसके बाद वे सभी लोकपाल उन कन्याओं के साथ अपनी-अपनी दिशाओं में चले गए। इन दिग्पालों के नाम पुराणों में दिशाओं के क्रम से निम्नांकित है-

लोकपाल दिग्पालों

* पूर्व के इंद्र

* दक्षिण-पूर्व के अग्नि

* दक्षिण के यम

* दक्षिण-पश्चिम के सूर्य

* पश्चिम के वरुण

* पश्चिमोत्तर के वायु

* उत्तर के कुबेर

* उत्तर-पूर्व के सोम।

शेष 2 दिशाओं अर्थात उर्ध्व या आकाश की ओर वे स्वयं चले गए और नीचे की ओर उन्होंने शेष या अनंत को प्रतिष्ठित किया। उर्ध्व दिशा के देवता ब्रह्मा हैं। अधो दिशा के देवता हैं शेषनाग जिन्हें अनंत भी कहते हैं।

ईशान दिशा : पूर्व और उत्तर दिशाएं जहां पर मिलती हैं उस स्थान को ईशान दिशा कहते हैं। इस दिशा के स्वामी ग्रह बृहस्पति और केतु माने गए हैं।

पूर्व दिशा : जब सूर्य उत्तरायण होता है तो वह ईशान से ही निकलता है, पूर्व से नहीं। इस दिशा के देवता इंद्र और स्वामी सूर्य हैं। पूर्व दिशा पितृस्थान का द्योतक है।

आग्नेय दिशा : दक्षिण और पूर्व के मध्य की दिशा को आग्नेय दिशा कहते हैं। इस दिशा के अधिपति हैं अग्निदेव। शुक्र ग्रह इस दिशा के स्वामी हैं।

दक्षिण दिशा : दक्षिण दिशा के अधिपति देवता हैं भगवान यमराज।

नैऋत्य दिशा : दक्षिण और पश्चिम दिशा के मध्य के स्थान को नैऋत्य कहा गया है। यह दिशा नैऋत देव के आधिपत्य में है। इस दिशा के स्वामी राहु और केतु हैं।

पश्चिम दिशा : पश्चिम दिशा के देवता, वरुण देवता हैं और शनि ग्रह इस दिशा के स्वामी हैं।

वायव्य दिशा : उत्तर और पश्चिम दिशा के मध्य में वायव्य दिशा का स्थान है। इस दिशा के देव वायुदेव हैं और इस दिशा में वायु तत्व की प्रधानता रहती है।

उत्तर दिशा : उत्तर दिशा के अधिपति हैं रावण के भाई कुबेर। कुबेर को धन का देवता भी कहा जाता है। बुध ग्रह उत्तर दिशा के स्वामी हैं। उत्तर दिशा को मातृ स्थान भी कहा गया है।

दिशाएं 10 होती हैं जिनके नाम और क्रम इस प्रकार हैं- उर्ध्व, ईशान, पूर्व, आग्नेय, दक्षिण, नैऋत्य, पश्चिम, वायव्य, उत्तर और अधो। एक मध्य दिशा भी होती है। इस तरह कुल मिलाकर 11 दिशाएं हुईं। हिन्दू धर्मानुसार प्रत्येक दिशा का एक देवता नियुक्त किया गया है जिसे 'दिग्पाल' कहा गया है अर्थात दिशाओं के पालनहार। दिशाओं की रक्षा करने वाले।

10 दिशा के 10 दिग्पाल : उर्ध्व के ब्रह्मा, ईशान के शिव व ईश, पूर्व के इंद्र, आग्नेय के अग्नि या वह्रि, दक्षिण के यम, नैऋत्य के नऋति, पश्चिम के वरुण, वायव्य के वायु और मारुत, उत्तर के कुबेर और अधो के अनंत।

* दक्षिण में माता दुर्गा और हनुमान जी की पूजा करें। 

* उत्तर में गणेश की पूजा करें।

* उत्तर-पूर्व दिशा में लक्ष्मीजी, कुबेर, शिव परिवार एवं राधा-कृष्ण की पूजा करें।

 पूर्व दिशा में श्री राम दरबार, भगवान विष्णु की आराधना एवं सूर्य उपासना करने से परिवार में सौभाग्य की वृद्धि होती है।

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  1. राधेकृष्णा , आपने बहुत अच्छी जानकारी दी।

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