Responsive Ad Slot

देश

national

ज्यूपिटर सायकल की खोज और कुंभ - आचार्य डॉ प्रदीप द्विवेदी

Tuesday, November 3, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

आचार्य डॉ प्रदीप द्विवेदी 

( वरिष्ठ सम्पादक- इंडेविन टाइम्स समाचार पत्र)

    ज्योतिषियों के अनुसार कुंभ का असाधारण महत्व बृहस्पति के कुंभ राशि में प्रवेश तथा सूर्य के मेष राशि में प्रवेश के साथ जुड़ा है। कई सहस्त्राब्दीयों से सम्राट हर्षवर्धन के भी पहले से , हम भारतीय हर 12 वर्ष में बृहस्पति चक्र के आधार पर महाकुंभ का महा आयोजन करते हैं । जबकि पाश्चात्यों को यह #बृहस्पति_चक्र बस कुछ ही वर्षों पहले पता चला है , जबकि हमारे पूर्वजों ने इसे हजारों वर्षों पहले ही जान लिया था ।

 बाद के परवर्ति संस्कृत ग्रंथों के अनुसार कितने वर्षों में ब्रहस्पति (बृहस्पति) एक कक्षा पूरा करने के लिए लेता है उसका अनुमानित समय मिलता है जो आज के वैज्ञानिकों के ठहराए समय से बिल्कुल approximate है, देखिए :

(1) सुर्य सिध्दांत : 4,332 दिन, 7 घंटे, 41 मिनट,44.4 सेकंड

(2) सिध्दांत शिरोमणि : 4,332 दिन, 5 घंटे, 45 मिनट, 43.7 सेकंड

(3) बीसवीं शताब्दी का कॅलकुलेशन : 4,332 दिन, 14 घंटे, 2 मिनट, 8.6 सेकंड

     

कुंभ का ज्ञात इतिहास इस प्रकार है - - 

       (किंतु इसका अर्थ यह नहीं कि कुंभ इतना ही प्राचीन है....) 

💥१०,००० ईसापूर्व (ईपू) - इतिहासकार एस बी राय ने अनुष्ठानिक नदी स्नान को स्वसिद्ध किया। 


💥६०० ईपू - बौद्ध लेखों में नदी मेलों की उपस्थिति।


💥४०० ईपू - सम्राट चन्द्रगुप्त के दरबार में यूनानी दूत ने एक मेले को प्रतिवेदित किया।


💥ईपू ३०० ईस्वी - रॉय मानते हैं कि मेले के वर्तमान स्वरूप ने इसी काल में स्वरूप लिया था। विभिन्न पुराणों और अन्य प्राचीन मौखिक परम्पराओं पर आधारित पाठों में पृथ्वी पर चार विभिन्न स्थानों पर अमृत गिरने का उल्लेख हुआ है। सर्व प्रथम आगम अखाड़े की स्थापना हुई कालांतर मे विखंडन होकर अन्य अखाड़े बने

💥५४७ - अभान नामक सबसे प्रारम्भिक अखाड़े का लिखित प्रतिवेदन इसी समय का है।

💥६०० - चीनी यात्री ह्यान-सेंग ने प्रयाग (वर्तमान प्रयागराज) पर #सम्राट_हर्ष द्वारा आयोजित कुम्भ में स्नान किया।

💥९०४ - निरन्जनी अखाड़े का गठन।

💥११४६ - जूना अखाड़े का गठन।

💥१३०० - कानफटा योगी चरमपंथी साधु राजस्थान सेना में कार्यरत।

💥१३९८ - तैमूर, हिन्दुओं के प्रति सुल्तान की सहिष्णुता के दण्ड स्वरूप दिल्ली को ध्वस्त करता है और फिर हरिद्वार मेले की ओर कूच करता है और हजा़रों श्रद्धालुओं का नरसंहार करता है। विस्तार से - १३९८ हरिद्वार महाकुम्भ नरसंहार

💥१५६५ - मधुसूदन सरस्वती द्वारा दसनामी व्यव्स्था की लड़ाका इकाइयों का गठन।

💥1678 -प्रणामी संप्रदायके प्रवर्तक, महामति श्री प्राणनाथजीको विजयाभिनन्द बुद्ध निष्कलंक घोषित ।

💥१६८४ - फ़्रांसीसी यात्री तवेर्निए नें भारत में १२ लाख हिन्दू साधुओं के होने का अनुमान लगाया।

💥१६९० - नासिक में शैव और वैष्णव साम्प्रदायों में संघर्ष; ६०,००० मरे।


💥१७६० - शैवों और वैष्णवों के बीच हरिद्वार मेलें में संघर्ष; १,८०० मरे।


💥१७८० - ब्रिटिशों द्वारा मठवासी समूहों के शाही स्नान के लिए व्यवस्था की स्थापना।


💥१८२० -हरिद्वार मेले में हुई भगदड़ से ४३० लोग मारे गए। 


💥१९०६- ब्रिटिश कलवारी ने साधुओं के बीच मेला में हुई लड़ाई में बीचबचाव किया।


💥१९५४ - चालीस लाख लोगों अर्थात भारत की १% जनसंख्या ने प्रयागराज में आयोजित कुम्भ में भागीदारी की; भगदड़ में कई सौ लोग मरे।


💥१९८९ - गिनिज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने ६ फ़रवरी के प्रयाग मेले में १.५ करोड़ लोगों की उपस्थिति प्रमाणित की, जोकी उस समय तक किसी एक उद्देश्य के लिए एकत्रित लोगों की सबसे बड़ी भीड़ थी।


💥१९९५ - प्रयागराज के “अर्धकुम्भ” के दौरान ३० जनवरी के स्नान दिवस को २ करोड़ लोगों की उपस्थिति।


💥१९९८ - हरिद्वार महाकुम्भ में ५ करोड़ से अधिक श्रद्धालु चार महीनों के दौरान पधारे; १४ अप्रैल के एक दिन में १ करोड़ लोग उपस्थित।


💥२००१ - प्रयागराज के मेले में छः सप्ताहों के दौरान ७ करोड़ श्रद्धालु, २४ जनवरी के अकेले दिन ३ करोड़ लोग उपस्थित।


💥२००३ - नासिक मेले में मुख्य स्नान दिवस पर ६० लाख लोग उपस्थित।


💥२००४ - उज्जैन मेला; मुख्य दिवस ५, १९, २२, २४ अप्रैल और ४ मई।


💥२००७ - प्रयागराज में अर्धकुम्भ। पवित्र नगरी प्रयागराज में अर्धकुम्भ का आयोजन ३ जनवरी २००७ से २६ फ़रवरी २००७ तक हुआ।


💥२०१० - हरिद्वार में महाकुम्भ प्रारम्भ। १४ जनवरी २०१० से २८ अप्रैल २०१० तक आयोजित किया गया । विस्तार से - २०१० हरिद्वार महाकुम्भ


💥२०१५ - नाशिक और त्रयंबकेश्वर में एक साथ जुलाई १४ ,२०१५ को प्रातः ६:१६ पर वर्ष २०१५ का कुम्भ मेला प्रारम्भ हुआ और सितम्बर २५,२०१५ को कुम्भ मेला सम्पन्न। 


💥२०१६ - उज्जैन में २२ अप्रैल से आरम्भ


💥२०१९ - प्रयागराज में अर्धकुम्भ


💥२०२२ - हरिद्वार में कुम्भ लगेगा।


वैज्ञानिक अध्यात्मिक महत्ता

    आध्यात्मिक दृष्टि से अर्ध कुंभ के काल में ग्रहों की स्थिति एकाग्रता तथा ध्यान साधना के लिए उत्कृष्ट होती है।

     ज्योतिषियों के अनुसार कुंभ का असाधारण महत्व बृहस्पति के कुंभ राशि में प्रवेश तथा सूर्य के मेष राशि में प्रवेश के साथ जुड़ा है। ग्रहों की स्थिति हरिद्वार से बहती गंगा के किनारे पर स्थित हर की पौड़ी स्थान पर गंगा जल को औषधिकृत करती है तथा उन दिनों यह अमृतमय हो जाती है। यही कारण है ‍कि अपनी अंतरात्मा की शुद्धि हेतु पवित्र स्नान करने लाखों श्रद्धालु यहाँ आते हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से अर्ध कुंभ के काल में ग्रहों की स्थिति एकाग्रता तथा ध्यान साधना के लिए उत्कृष्ट होती है।


निष्कर्ष :

(1) बृहस्पति चक्र के बारे में भारतीय, कुंभ की परंपरा जितनी प्राचीन है ( ईसा पूर्व १०, ००० से अधिक ) उतने या उससे भी अधिक समय पहले से पूर्णतया परिचित थे। 


(2) यह परंपरा योगिक और वैदिक आर्य परंपरा थीं। इसका संबंध वैदिक विज्ञान और उसके योग तथा ध्यान पर केंद्रित सुक्ष्म आयामों से था। ध्यान अनादि है इसलिए यह परंपरा और भी बहुत पुरानी हो सकती है।


(3) इसके बाद बृहस्पति या ज्यूपिटर सायकल के समय को बताने वाले दो ग्रंथ मिलते हैं जिन्हें हम सुर्य सिध्दांत, सिध्दांत शिरोमणि के नाम से जानते हैं। इन ग्रंथों के अलावा वेद पर आधारित गणितीय ग्रंथ जो नष्ट हो गए निश्चित रूप से इसके सटिक कॅलकुलेशन को जानते थे जो कि सुर्य सिध्दांत के भी पूर्व रचे गये थे। इसलिए हम एतिहासिक ज्ञात तथ्यों से पाते हैं कि ईसा पूर्व सहस्त्रों वर्ष पूर्व में भी कुंभ की यह परंपरा विद्यमान थी अपने इस शास्त्रीय महत्व के साथ।


(4) समय समय पर इसमें अनेक लोग और आते गये जुड़े और परंपरा व्यापक हुई। कभी यह परंपरा आक्रांताओं से, शासक तथा शासन से भी प्रभावित हुई होगी। कभी इसका स्वरूप बदल देने सम्राट हर्ष जैसे सर्वस्व दानी भी आए जिन्होंने इसे अत्यंत महत्वपूर्ण बनाया।

नोट :  सुर्य सिध्दांत तथा सिध्दांत शिरोमणि के समय से कई सदियों बाद टाॅलेमी बृहस्पति सायकल पर लिखता है जो कि उपरोक्त भारतीय ग्रंथों की नकल थी।  टाॅलेमी ने विक्रमादित्य के विक्रम संवत् का उल्लेख किया है। विक्रम काल में रोम के जुलिअस सीजर ने जुलियन कैलेण्डर भारतीय ज्योतिष तथा विक्रम संवत् आदि कैसे नकल करके अपना जूलियन कैलेण्डर और इसवी सन आदि सुरू किए यह हम पूर्ववत लेखों में देख चुके हैं।

No comments

Post a Comment

Don't Miss
© all rights reserved
Managed By-Indevin Infotech-Leading IT Company