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किसान आंदोलन का बदलता रुख - निखिलेश मिश्रा

Saturday, November 28, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

निखिलेश मिश्रा, लखनऊ

 किसान आंदोलन का बदलता रुख मुझे लिखने को बाध्य कर रहा है। मुझे पक्षपात करना नही आता है, स्वविवेकानुसार जो सत्य महसूस होता है लिख देता हूँ। मेरी समझ से सिक्ख कौम देश की सबसे जनपरोपकारी और अपने मे मस्त रहने वाली कौम है। वह अनावश्यक खुराफात प्रपंच लड़ाई झगड़े में तबतक नही पड़ती जब तक कि उस पर मुंडी तक पानी ना आ जाये, अन्यथा वह अपने कामो में अपने को व्यस्त रखती है।

किसानों की समस्या है तो यह पूरे देश के किसानों की समस्या होनी चाहिए। तकलीफ है तो देश के सभी राज्यो के किसानों और उनके संगठनों को एकजुट होकर खड़ा होना चाहिए लेकिन अगर केवल पंजाब हरियाणा के ही सिक्ख किसान अपना अपना परिवार लेकर सरकार के खिलाफ आंदोलन लेकर कूद चुके है तो इसका सीधा सा अर्थ है कि प्रकरण का न्यूनाधिक्य मात्रा में राजनीतिकरण अवश्य हो चुका है। 

यह समस्या इन्हें तबसे है जब यह कानून नही बना था अर्थात कानून बनने की तैयारी में था। तब खट्टर सरकार ने इन पर लाठियां बरसाई थी। नेशनल मीडिया वह खबर खा गई थी लेकिन मैंने उसी दिन इस घटना को अपनी वाल पर लिखा था और इन तीनो कानूनों/बिल्स के गुण दोषों को भी लिखा था।

पहले सबकुछ ड्राफ्ट था, कानून की शक्ल में नही था तब भी वहां इन पर लाठियां चटक रही थी और ये मंडियों में जाम करने सड़को पर कूच कर गए थे। मतलब साफ है कि इन्हें मिसगाइड किया जा रहा था। 

कोई भी नया कानून व्यवस्था में सुधार के उद्देश्य से लाया जाता है बदहाल के लिए नही। जहां तक एमएसपी का प्रश्न है तो संविधान में इसकी व्यवस्था कही नही है। आजादी के बाद के शुरुआती दशकों में किसान इस बात को लेकर काफी परेशान थे कि अगर किसी फसल का बंपर उत्पादन हो जाए तो उन्हें उसके अच्छे दाम नहीं मिल पाते थे। इस तरह से किसानों की लागत भी नहीं निकल पाती थी, जिस कारण वो आंदोलन करने लगे।

तत्पश्चात लाल बहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्री रहते हुए ०१ अगस्त, १९६४ को एल०के० झा के नेतृत्व में एक समिति बनी, जिसका काम अनाजों की कीमतें तय करने का था। समिति की सिफारिशें लागू होने के बाद १९६६-६७ में पहली बार गेहूं के लिए MSP का ऐलान किया गया।

इसके बाद से हर साल सरकार बुवाई से पहले फसलों के MSP घोषित कर देती है। MSP तय करने के बाद सरकार स्थानीय सरकारी एजेंसियों के जरिये अनाज खरीदकर फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (FCI) और नेफेड के पास उसका भंडारण करती थी। फिर इन्हीं स्टोर्स से सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के जरिये गरीबों तक सस्ते दामों में अनाज पहुंचाया जाता था।

शुरुआत में केवल गेहूं के लिए MSP तय किया गया था। इससे किसान बाकी फसलों को छोड़कर सिर्फ गेहूं की फसल उगाने लगे, जिससे अनाजों का उत्पादन कम हो गया। फिर सरकार की तरफ से धान, तिलहन और दलहन की फसलों पर भी MSP दिया जाने लगा।

फिलहाल धान, गेहूं, मक्का, जई, जौ, बाजरा, चना, अरहर, मूंग, उड़द, मसूर, सरसों, सोयाबीन, शीशम, सूरजमूखी, गन्ना, कपास, जूट समेत २० से अधिक फसलों पर MSP दिया जाता है।

देश में MSP तय करने का काम कृषि लागत एवं मूल्य आयोग का है। कृषि मंत्रालय के तहत काम करने वाली यह संस्था शुरुआत में कृषि मूल्य के नाम से जानी जाती थी। बाद में इसमें लागत भी जोड़ दी गई, जिससे इसका नाम बदलकर कृषि लागत एवं मूल्य आयोग हो गया। यह अलग-अलग फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य का निर्धारण करती है। वहीं गन्ने का MSP तय करने की जिम्मेदारी गन्ना आयोग के पास होती है।

MSP तय करने की प्रकिया काफी जटिल और लंबी होती है। इसके लिए आयोग अलग-अलग इलाकों में किसी खास फसल की प्रति हेक्टेयर लागत, खेती के दौरान आने वाले खर्च, सरकारी एजेंसियों की स्टोरेज क्षमता, वैश्विक बाजार में उस अनाज की मांग और उसकी उपलब्धता आदि मानकों के आंकड़े इकट्ठा करता है। इसके बाद सभी हितधारकों और विशेषज्ञों से सुझाव लिए जाते हैं। अंत में आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति इस पर अंतिम फैसला लेती है।

सरकार भले ही २० से ज्यादा फसलों के लिए MSP तय करती है, लेकिन आमतौर पर सरकारी स्तर पर खरीद केवल गेहूं और धान की हो पाती है। ऐसे में सभी किसानों को MSP का फायदा नहीं मिल पाता। इसकी वजह यह है कि गेहूं और धान को सरकार PDS प्रणाली के तहत गरीबों को देती है इसलिए उसे इसकी जरूरत होती है। बाकी फसलों की उसे इतने बड़े स्तर पर जरूरत नहीं पड़ती, इसलिए उनकी खरीद नहीं होती।

एमएसपी तय होने की प्रक्रिया अब भी उपरोक्तानुसार यथावत जारी है। किसानों को मिसगाइड किया जा रहा है कि नए कानून में एमएसपी समाप्त कर दी गयी जबकि सपष्ट है कि एमएसपी तय करने की बाध्यता रखने वाला कोई कानून देश मे पहले भी नही था।

मेरी राय में अब समय है कि अपने अनाज का दाम सरकार नही बल्कि किसान खुद तय करें। साल का नफा नुकसान देखकर शाक भाजी तरकारी फल इत्यादि शीघ्र खराब होने वाले उत्पादन का भी न्यूनतम दाम तय करें। 

मुझे नही लगता कि सरकार ने इनका कोई अहित किया है। फिरभी सरकार को चाहिए कि वे विनम्रता पूर्वक इनकी बात सुनकर इनका शंसय शान्त करें न कि पोलिस द्वारा पुल पर वाटर कैनन का इस्तेमाल कर के अनप्रोफेशनल तरीके से इनके साथ आतंकवादियों सा बर्ताव करें।

इनपर हमला देश भर के किसानों को केंद्र सरकार के विरुद्ध एकजुट होने को बाध्य कर देगा। ये अन्नदाता है इनकी हाय से बचना ही उचित होगा और जिन लोगो ने इन्हें मोहरा बनाकर इनके बीच खालिस्तानी और भिंडरावाले के समर्थक घुसेड़े हैं उन्हें चिन्हित किया जाना चाहिए क्योंकि वे भाजपा या मोदी जी के नही बल्कि इस देश के दुश्मन हैं।

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